गुरुवार, 6 अगस्त 2020

हमारी प्यारी साइकिल

 


                                                     हमारी प्यारी साइकिल 


पहले पहल आसमान से बातें करने की ललक जगाती है साइकिल l लड़कपन में साइकिल के पेडल पर खड़े होकर यूँ लगता है जैसे बादलों का झप्पट्टा मार मुट्ठी में बंद किया जा सकता है l दोस्तों के साथ साइकिल की दौड़ हवा को पहली चुनौती देने जैसा होता था लेकिन हवा के लिए ये खेल जैसा होता था l जीतती भौ वही थी और खेलते खेलते बालों को खूब चिढ़ाती थी l
कई दिनों से फिर से साइकिल चलाने का मन करता हैl आखिरी बार कब चलाई थी, याद नहीं है l

           शुरूआती बचपन में मुझे साइकिल चलाने का शौक नहीं रहा l बारह बरस का था जब दिल्ली से पूना गयाl वहाँ सब           साइकिल चलाते थे l मुझे भी साइकिल सीखने की धुन सवार हो गई l

 

पिताजी के पास बड़ी वाली हीरो साइकिल थी मेरे जन्म से भी पहले खरीदी हुई l वो बड़े गर्व से बताते थे, "सिर्फ 50 रूपये की सेकंड हैंड खरीदी थी l बहुत साथ दिया है इसने l कितनी सारी यादें जुड़ी हैँ इसके साथ l तुम सबका बचपन इसने भी देखा है l जब निधि बैठने लायक हुई थी तब छोटी सी गद्दी लगवाई थी लाल रंग की l फिर तू बैठने लायक हुआ तो एक और लगवाई l निधि तो कितनी बार सो भी जाती थी और मेरे हैंडल पकड़े हाथ पर सिर टिका लेती थी" पता नहीं कितनी बार बताया था पिताजी ने l हर बार उनकी आँखों में चमक आ जाती थी l
दूसरी चीजों की तरह पिताजी अपनी साइकिल का भी बड़ा ध्यान रखते थे l 

 

एक दिन ज्यादा सनक चढ़ी तो पापा की साइकिल खुद ही लेकर निकल पड़ा मैं l कैंची चलाने की कोशिश की l कुछ सफलता मिली पर फिर बहुत बुरी तरह गिरा l घुटने और ठोड़ी छिल गई l तब के बाद मैंने कभी कैंची नहीं चलाई l समझ भी नहीं पाया कि लोग आखिर इतने अटपटे तरीके से साइकिल चलाते क्यों हैँ जबकि वो इतने आरामदायक तरीके से चल सकती है l

 

अगले दिन स्कूल में सबको पता चल गया कि नया बालक साइकिल सीखते सीखते गिर गया l जिनको ये हुनहर आता था उन्होंने हमारी खिल्ली ऐसे उड़ाई जैसे वो यह चक्रव्यूह भेदना अभिमन्यु की तरह सीखे थे l
इतवार को पिताजी ने हमें साइकिल सीखाने का बीड़ा उठाया l घर के पीछे वाले मैदान में सीधा गद्दी पर सवार कर दिया और घंटे -डेढ़ घंटे के अभियान में गिरने भी ना दिया l उस दिन हम घर ऐसे लौटे जैसे राणा प्रताप पहले दिन घोड़े की सवारी करके लौटे होंगे l 

 

अगली शाम पिताजी के पीछे पड़ना पड़ा l वो अनमने मन से गए और पंद्रह मिनट में लौटा लाए l अगले रोज़ हमने पिताजी को कष्ट नहीं दिया l एक दोस्त को बुला रखा था l पर वो दोस्त ही क्या जो दुश्मनी ना निभाए l
भाई साहब ने दस मिनट बाद ही हमें एक्सपर्ट घोषित कर दिया l साइकिल ने बहुत बुरी तरह पटका मुझे l कच्ची चोटें फिर हरी हो गईं l साथ में कुछ एक नई भी मिल गईं l साइकिल का एक पेडल भी लटक गया l अपनी चोटों से ज्यादा साइकिल की चोट की चिंता थी मुझे l पिताजी उसी से दफ़्तर जाते थे l घर में उतावली का इनाम मिलना तय था l पिटाई से बचने के लिए रोनी सूरत बनाई, आँखों में थूक लगाया और खराब वाली एक्टिंग की l थप्पड़ नहीं पड़ा बस पर लताड़ ढाई सौ ग्राम ज्यादा पड़ी l

गिरते पड़ते कुछ दिनों में साइकिल चलानी आ गई l मेरे बाद मेरी बड़ी बहन और मुझसे छोटी बहन ने भी साइकिल सीखी l फिर पड़ोस में रहने वाली एक आंटी के साथ मिलकर माताजी ने भी सीख ली l 
  जब माताजी ने साइकिल सीख ली तब हमारे यहाँ एक नई साइकिल आई l   स्पोर्ट्सलिंक की लेडीज साइकिल -लाल रंग की l तभी हमें पता चला साइकिल भी द्विलिंगी  होती है l
उस साइकिल से पहली बार मैंने साइकिल मैराथन में भाग लिया था l पूना के पथरीले ऊँचे नीचे रास्तों पर साइकिल चलाने का मज़ा ही अलग है l 
एक दो साल लेडीज साइकिल खूब चलाई l फिर लड़के चिढ़ाने लगे l मैं फिर से पिताजी की 24 इंची मर्दाना साइकिल चलाने लगा l 

 

क्रिकेट के मैच खेलते जाते समय आगे एक दोस्त और पीछे क्रिकेट की बड़ी सी किट लादकर कई बार उल्टी हवा से लड़ा हूँ मैं l कई बार ट्रिपल सीट पर अपनी ताकत की शेखी बखारी l
साइकिल से कई बार चोट भी खाई l लेकिन साइकिल चलाने वालों को अपनी चोट से ज्यादा साइकिल की चोट की ज्यादा चिंता रहती है l

 

पापा की प्यारी सेकंड हैंड साइकिल ने बुरे समय में मेरा भी बहुत साथ दिया l गरीबी के समय में गारमेंट्स का बड़ा सा बोरा उस बूढ़ी साइकिल के करिअर पर बाँधें कई किलोमीटर दूर से लाया और छोड़ा है मैंने l कई बार जेब में अठन्नी भी ना होती थी l मन में डुबका लगा रहता था कि पंक्चर हो गया तो क्या करूँगा l पर वो साइकिल पोते की तरह प्यार करती थी मुझे l शायद ही कभी रूठी हो l मैं थक जाता था वो कभी हाँफती ना थी l 
जीवन की कठिन परीक्षाओं से उबारने में पापा की चहेती साइकिल ने हमारे परिवार का बहुत साथ दियाl मैंने स्कूटर ले लिया l बूढ़ी साइकिल को आराम मिल गया l हम कभी कभार ही उसे चलाते थे l 

 

फिर एक दिन किसी अखबार बाँटने वाले लड़के की साइकिल चोरी हो गई l उसने हमसे साइकिल बेचने की बात पूछी तो पापा ने उसे ऐसे ही दे दी l 
कभी कभार वो दिखता तो पापा साइकिल से ऐसे मिलते जैसे कोई बिछड़े दोस्त से मिलता है l बुरी हालत में होती तो लड़के को डाँट भी देते थे l 

 

काफी वक़्त गुज़र गया l घर में तीन कारें आ गईं l मोटर-साइकिल आई, चली गईं l पिताजी भी चले गए l पिताजी तो रोज़ याद आते हैँ पर साइकिल की याद तब जरूर आती है जब मैं अपने बचपन या बुरे दिनों को याद करता हूँ l
काले रंग की 24 इंची हीरो साइकिल वाकई हीरो थी l वह हमारे बचपन से जवानी तक आड़े तिरछे हर वक़्त में सहभागी रही l आज पता नहीं वो होगी या नहीं होगी l होगी तो ना जाने किस हाल में होगी l

           हम उस साइकिल के हमेशा कृतज्ञ रहेंगे l


शनिवार, 2 मई 2020

आँखोंदेखी #लॉक डाउन स्पेशल





                          आँखोंदेखी 


                 #लॉक डाउन स्पेशल 

गुप्ता जी ने सुबह से पहली बार शायद बालकनी से सड़क पर झाँका था l हमेशा की तरह सिर्फ नकली जॉकी वाले कच्छे में थे l तोंद देश की जनसंख्या से प्रतियोगिता करती थी उनकी l
दाढ़ी के मुरझाए बाल और भारी आँखें अंतर का हाल कह रही थी l पिछली रात गुप्ताइन ने तुरई की सब्जी बनाने से मना कर दिया था l 
तनातनी हो गई थी l गुप्ता जी का ब्लड-प्रेशर तब से ही हाई था l बिना AC के सेठ जी को नींद भी नहीं आती थीl

12 बजे बिस्तर छोड़ा था l

सामने वाली दुकान का शटर गिराकर तीन लोग सड़क पर बैठे कोरोना पुराण सुना रहे थे l चौथी कुर्सी खाली थी l
गुप्ता जी ने लपक कर टी शर्ट गले में डाली और यूँ भागे जैसे महफिल के मुख्य अतिथि वो ही हों l
जीना उतरते उतरते टी शर्ट ने उनका समृद्धि-चिन्ह ढक लिया था l
वहाँ जाकर खड़े हुए कि लोग बैठने को कहेंगे l जब निमंत्रण ना मिला तो खुद ही बैठ गए l 

"बड़े दिनों बाद दिखे... लॉक डाउन का ढंग से पालन कर रहे हो, " तिवारी जी ने गुटखा हथेली पर परोसते हुए कहा l
"BP हाई हो रिया है कई रोज़ से," गुप्ता जी ने रजनीगंधा से भरे मुँह से बतलाया l
फिर क्या था,  बारी-बारी से ब्लड प्रेशर कम करने के नुस्खे आने लगे l
गुप्ता जी कुर्सी से खड़े होने को हुए तो मलिक साहब ने उठने ना दिया,  "अम्मा, बैठो भी यार l"
"धनिया लेने उतरा था, चटनी बनेगी l वो इंतजार में बैठी है " गुप्ता जी गरियाये l
"आ जाएगा धनिया वाला,  यहीं आएगा, " कोरोना एक्सपर्ट मलिक साहिब ने ऐसे बोला जैसे जिले के सब्जीवालों की एक -एक मूवमेंट की खबर रखते हों l
पाँच मिनट बाद गुप्ता जी को घर से हाज़िर होने का फरमान आ गया l
"पापा,  मम्मी बुला रही हैँ "
गुप्ता जी बिना धनिया लिए ही भाग लिए l अभी तो रात का बी.पी.  भी नार्मल ना हुआ था l तीन लोगों के ठहाकों से सड़क गूँज उठी l

शुक्रवार, 17 अप्रैल 2020

"मैं न गा पाता हूँ , न ही नाच पाता हूँ "







         "मैं न गा पाता हूँ , न ही नाच पाता हूँ "


तीसरी क्लास में मोहल्ले के ही एक प्राइवेट स्कूल में पढता था मैं | माँ भी उस ही स्कूल में पढ़ाती थीं | स्कूल में एक डांस टीचर भी आते थे | माँ ने मुझे और मेरी बहनों को कत्थक सिखाने के लिए मास्टरजी से बात कर ली | स्कूल खत्म होने के आधे घंटे बाद का समय तय हुआ | 
पहले दिन मैं भी अपनी बहनों जितना ही उत्साहित था | हम स्कूल से आए | माँ ने फटाफट फुलके सेके | सब्जी सुबह ही बनाकर गईं थीं | मास्टरजी के आते ही हम 'पग घुंघरू बाँध' तैयार हो गए |




लेकिन मास्टरजी ने आते ही सवा-दो रूपये थमाकर मुझे हलवाई की दूकान से लस्सी लाने भेज दिया | 
वो मोहल्ला नया-नया ही बसा था | काफी कम दुकानें थीं | वो भी हमारे घर से काफी दूर | 

लस्सी एल्युमीनियम के जंबो गिलास में मिलती थी | उस समय वो गिलास मेरे पौने हाथ के बराबर रहता होगा | गिलास के साथ लस्सी मिलने का अर्थ यह  था की मास्टरजी के लस्सी पी लेने के बाद गिलास वापिस भी करने आना होगा |
आधा किलोमीटर दूर से जुलाई की भरी दोपहरी लस्सी लाने और गिलास वापिस लौटा कर आने में आठ साल के बच्चे को जितना समय लगना चाहिए , मुझे भी उतना ही लगा होगा | लेकिन मास्टरजी की सेवा करने के चक्कर में हम पहले दिन कत्थक का मात्र एक स्टेप ही सीख पाए |

"ता थई- ता थई - तिग-था -तिग-तिग-थई "

अगले दिन भी यही हुआ | मास्टरजी ने लस्सी पी | हमने वही स्टेप कर के दिखाया और क्लास ख़तम हो गई | 
अगले दिन हमने लस्सी ली और हलवाई की दूकान से थोड़ी दूर आकर खुद ही लस्सी का गिलास गटक लिया  | गिलास हलवाई को लौटाया और डकार लेते हुए घर लौट आए | 
मास्टरजी लस्सी का बेचैनी से इंतज़ार कर रहे थे | हमारा खाली हाथ देखकर पुछा " क्या हुआ? क्या दूकान बंद थी ?"

"नहीं, सर | गिलास हाथ से छूट गया | लस्सी बिखर गई थी तो मैं गिलास वापिस करके आ गया |" 

मास्टरजी को गहरा आघात लगा था | उन्होंने खींच कर एक रेहपट रसीद कर दिया | देखने में डेढ़ पसली के मास्टरजी का थप्पड़ तो गूंजा ही, हमारा राग भैरवी ही स्वतः ही शुरू हो गया | 
माँ ने बड़ी विनम्रता से मास्टरजी को अगले दिन से आने को मन कर दिया और इस तरह हम कत्थक में पारंगत होते होते रह गए | इतना ही नहीं , हम किसी बरात में भी घोड़ी के आगे नाच नहीं पाते | कई लोग हमसे इस बात पर नाराज़ हो जाते हैं | पर हम क्या करें ? 


हाँ, ""ता थई- ता थई - तिग-था -तिग-तिग-थई " वाला स्टेप हम आज भी करके दिखा सकते हैं |



हाँ जी, तो अब हम बताते हैं कि हम गा  क्यों नहीं पाते ...

अगले वर्ष, यानि कक्षा चार में हम एक दूसरे स्कूल में पढ़ते थे | स्कूल में किसी प्रोग्राम के लिए ग्रुप-सांग के लिए हमें भी चुना गया | स्कूलों में यह दिक्कत है कि किसी भी एक्टिविटी के लिए बच्चों का चुनाव शक्ल और पढाई कि परफॉरमेंस के हिसाब से ही होता है | गाने-बजाने या एक्टिंग की प्रतिभा को तो महत्व ही नहीं देते अध्यापक-गण |

"तुम समय की रेत पर छोड़ते चलो निशां... पुकारती तुम्हे ज़मीं, पुकारता है आसमां "
पंकज उधास जैसी शक्ल और मूंछों वाले गुरूजी पूरी तन्मयता से हारमोनियम के साथ गाते और फिर बच्चों से गाने को कहते | आगे वाली लाइन में दाएं से तीसरे नंबर पर खड़े थे हम | हमारे आवाज़ कोरस में शायद सबसे अलग आ रही थी | 

उस दिन बच्चों के साथ खेलते खेलते हमारी पैंट के सामने वाले सारे बटन टूट गए थे | बार-बार सहेजते पर खिड़की के कपाट फिर खुल जाते थे | शायद इस वजह से भी हमारे सुर नहीं लग रहे थे |
संगीत-सम्राट-तानसेन-तुल्य गुरूजी बार-बार गवाते पर हमारे आरोह-अवरोह पूरे ढीढ हो गए थे | 

गुरूजी का संयम टूट गया | उन्होंने हारमोनियम झटके से परे किया और उबाल पड़े , "पैंट के बटन लगा नहीं सकता है , गाना क्या गा पायेगा ? भाग जा यहाँ से |" 
ग्रुप में लड़कियां भी थीं | स्कूल में इज़्ज़त थी हमारी | गुरूजी ने मिटटी में मिला दी | 








हम कई दिन तक सदमे में रहे |

नार्मल हुए तो प्रण  कर चुके थे कि  कभी गाना नहीं गाएंगे | कभी गाया  भी नहीं | हाँ, गाने सुनते हैं | गीतों और कविताओं का शौक है | गुलज़ार साहिब और साहिर साहिब की पूजा करते  हैं | पर गाना सुनाने की कभी कोशिश नहीं करते |
एक बात और, बटन वाली पैंट भी तब के बाद आज तक नहीं पहनी हमने | आप भी मत पहनना और न ही अपने बच्चों को पहनाना | नहीं तो , वो भी गाना नहीं सीख पाएंगे |



गुरुवार, 22 अगस्त 2019

आई.सी.यू.



आई.सी.यू.






आई.सी.यू. के पलंग पर पड़ा
वो निसहाय निरीह आदमी 
जिंदगी और मौत को झगड़ते 
देखता है खामोश डरा हुआ 
जैसे कोई बच्चा कोने में 
दुबका देखता है 
अपने माँ-बाप को झगड़ते हुए 
नहीं जानता वो किसके हिस्से में जाएगा l

बाहर रिश्तेदारों की भीड़ है 
पता नहीं वो थैले में 
आशा और हौंसला लाए हैं 
या आखिरी बार मिल लेने की औपचारिकता 
सबके पास बातें हैं, किस्से हैं, 
पर उसके लिए शायद इतना काफी है 
कि वो आए हैं 
किसी के लिए वक़्त खर्च देना 
भी तो बड़ी बात है 


साँसों का मोहताज वो आदमी 
महसूस करता है 
अपनी कमर के नीचे तड़पती 
अपनी जिम्मेदारियाँ,
बच्चों का भविष्य और
पत्नी का सिन्दूर 
वो चाहता है कमर उचका कर 
उन सब को अलग हटा दे 
पर वो चुभन जिन्दा होने का अहसास है l

अभी कुछ देर पहले ही 
सब मिल गए हैं उससे
माथे की सिलवटों को 
बड़ी शिद्दत से छुपाकर
दो दिन बाद बेटी की फीस भरनी है 
एक हफ्ते बाद बेटे का जन्मदिन है 
और महीने बाद करवा-चौथ है शायद 
उसने देखा था 
सबकी ख्वाहिशें पिघलकर 
आँखों में जमा होने लगीं थीं l

कल तक भाग भाग कर 
उसने सारे कर्तव्यों की किश्त भरी थी 
रात को खाना बड़े प्यार से परोसा था पत्नी ने 
उसने बड़े चाव से खाया था 
पर आधी रात अचानक जिंदगी कसमसाने लगी 
बेचैनी, घबराहट, पसीना- 
सासें उखड़ने लगी 
कुछ देर बाद वो पतंग जैसा था 
जिसकी डोर कफ़न-सा सफ़ेद कोट पहने 
डॉक्टरों के हाथ में थी 
जो शायद भावनाएँ
अपने बैंक के लाकर में रख आये थे 
रोज़ न जाने कितने आते थे उस जैसे 
खर्च करते भी तो किस-किस पर करते l

वो चाहता था उठ कर भाग जाना 
कर्तव्यों की अगली किश्त जुटाना 
पर उसका शरीर उसके वश में ना था
पर अपंग भावनाएँ थीं 
जो आसमान समेट लाना चाहतीं थीं 
सारे कर्तव्य एक साथ पूरे कर देना चाहतीं थीं 
वो जिम्मेदारियों को कमर के नीचे से निकालकर
अपने पेट पर रख लेता है 
और मौत से मोहलत माँगने लगता है l

शनिवार, 20 जुलाई 2019

परवर्ट... यानि छिछोरा




परवर्ट... यानि छिछोरा 



सेंट स्टीफेन कॉलेज के सामने की सड़क  रोज की तरह  उस दिन भी सुनसान थी l नार्थ कैंपस का सबसे वीरान इलाका था ये जबकि देश के सबसे विलक्षण युवा पढ़ते होंगे यहाँ l
कॉलेज के गेट से पचास मीटर दूर बस स्टॉप पर सुजॉय  अकेला खड़ा था l पिछले आधे घंटे में कॉलेज के मैन गेट से कई महँगी गाड़ियाँ और मोटर -साइकिल धड़धड़ाती हुई निकल गईं थीं l पर बस स्टॉप पर कोई नहीं आया l 

वहाँ खड़े-खड़े काफी वक़्त निकल गया था l डीटीसी की बसें हमेशा से ही बड़ी मूड़ी रही हैं l 
तभी कॉलेज के गेट से रौनक बहार आई l "शायद मेरे  लम्बे इंतज़ार का इनाम है ये ," सुजॉय ने सोचा  l खादी ग्रामोद्योग  वाला कुर्ता और काली जीन्स l बुद्धिजीवियों वाला पहनावा l  साथ में लोटो के स्पोर्ट्स शूज l मझली लम्बाई वाले खुले बाल जो दिल्ली की गर्मी से बेहाल निस्तेज कांधो पर पड़े थे l वो जब तक सुजॉय तक पहुंची, वो  उसका सम्पूर्ण आकलन कर चुका था l मन ही मन चाह रहा था कि वो भी वहीँ आकर खडी  हो जाए और फिर वो  दोनों बस का इंतज़ार करें l 

वो सीधा सुजॉय तक आ गई l वो  खुश तो था पर सकपका गया था l 

उसने अपना कुर्ता एक तरफ से ऊपर किया और जेब में हाथ डालकर सिगरेट  की डब्बी निकाली l फिर सुजॉय की  आँखों में देखकर बोली, "डू यू हैव ए लाइट ?" 

सुजॉय  भावशून्य सा उसे देखता रहा l पता नहीं अचम्भा था या मलाल l पहली बार किसी लड़की ने सिगरेट जलाने के लिए उससे  माचिस माँगी थी l और उसके  पास थी नहीं l 

अपना आग्रह दोहराने के लिए उसके होंठ हिले ही थे कि सुजॉय ने  'सॉरी' बोल दिया l वो हल्का सा मुस्काई मानो लानत भेज रही हो और आगे बढ़ गई l सुजॉय का मन हुआ उसका पीछा करे  पर उसने  ठीक नहीं समझा l वो बस उसे दूर जाते हुए देखता रहा l उसे रास्ते में जो भी मिला उसने उनसे माचिस माँगी लेकिन उसकी सिगरेट की उम्र शायद बाकी थी l 

दिन भर सिगरेट-सुंदरी सुजॉय के  ख्यालों में आती-जाती रही l अगले दिन वो  उस ही समय पर सेंट स्टेफेन के बस स्टैंड पर पहुँच गया था और माचिस भी खरीद कर जेब में रख ली थी l 

लगभग उस ही समय पर वही लड़की कॉलेज के गेट से बहार आई l नीली ज़मीन पर सफ़ेद फूलों वाली फ्रॉक बमुश्किल घुटनों तक पहुँच रही थी l पर उसमे वो पिछले दिन से ज्यादा छरहरी लग रही थी l

बाल वैसे ही थे जैसे किसी बच्चे को डाँट-डपट कर बिठा दिया हो l वो सुजॉय के  पास पहुँचती उससे पहले ही उसने  माचिस निकाल कर इशारे से उसे दिखा दी l वो मुस्कुराई, "आई  डोंट  हैवे ए सिगरेट टुडे l " कहकर आगे बढ़ गई l 

निराशा कुछ क्षणों में ही सुजॉय के  उत्साह को लील गई l उसने  खुद को कोसा , "माचिस के साथ दो सिगरेट भी खरीद लेता तो क्या चला जाता l "

अगले दिन क्लासिक रेगुलर की डब्बी और म्यूजिकल लाइटर के साथ सुजॉय  मोर्चे पर तैनात था l उत्साह और उमंग दोनों उफन रहे थे l 
वो कुछ मिनट जल्दी निकल आई थी l सुजॉय  उसे देखते ही आगे आ गया और मुस्कुराने लगा l एक हाथ में सिगरेट की डब्बी और एक हाथ में लाइटर l 

वो कुछ पंद्रह कदम दूर थी जब सुजॉय से  रहा नहीं गया , " आज मैं दोनों लाया हूँ l "
वो गंभीर थी l "इवन आई हैव बोथ ... बट , इट सीम्स, यू आर ए परवर्ट l फ़क ऑफ और आई  विल कॉल पुलिस l "
सुजॉय आगे बढ़ गया l परवर्ट... यानि छिछोरा l सही तो कहाँ उसने l 
सुजॉय कई दिनों तक किसी लड़की  को आँख उठाकर देख नहीं पाया l 

रविवार, 26 मई 2019

रोशन की शादी


कला के प्रति समर्पित एक अव्वल दर्जे के कलाकार दोस्त के जीवन का एक सच्चा प्रसंग ....

                     रोशन की शादी 





दो दिन में दूसरी बड़ी ख़ुशी l ऐसा पहले भी कभी हुआ था,  रोशन को याद नहीं आ रहा  था l परसों ही उसे नाटक में लीड रोल मिला था और आज खबर मिली कि सुलेमान मिर्ज़ा साहब मुख्य अतिथि होंगे l

सुलेमान साहब को गुरु मानता था रोशन l वही तो थे जिन्होने नेशनल स्कूल ऑफ़ ड्रामा में उससे  पहली बार अभिनय  करवाया था  वरना लोग तो  उसे बस गायक मानते थे l फिर कभी उनसे मिलना नहीं हुआl 
रोशन ठान चुका था कि नाटक के बाद सुलेमान साहब से मिलेगा और इस बार उनका फोन नंबर लेना नहीं भूलेगा l

नाटक के दौरान सुलेमान साहब दो -तीन बार उसकी ओर देख कर मुस्कुराये थे l नाटक खत्म हुआ तो रोशन ने फुर्ती से कपड़े बदले और बाहर भागा l सुलेमान साहब जा चुके थे l रोशन को घोर निराशा हुई l संघर्षशील शिष्य को गुरु का आशीर्वाद बूटी जैसा लगता है l रोशन को अपने गुरु के आशीर्वाद की जरूरत थी l 
अगले दिन उसे एक फ़ोन आया l नंबर अनजान था l उसने अनमना-सा 'हेलो ' बोला तो जवाब आया,  "मंज गए हो मियाँ तुमl"
"जी? " रोशन समझ नहीं पाया था l
"मिर्ज़ा बोल रहा हूँ,  बरखुरदार "
रोशन सन्न रह गया l मुँह से आवाज नहीं निकल रही थी l गूंगों की तरह टूटा -फूटा कुछ बोला l
"क्या बड़बड़ा रहे हो?  कल जरूरी काम था सो एक दम निकालना पड़ा l तुम्हारा नंबर ढुँढवाया हैं l क्या कर रहे हो आजकल? " सुलेमान साहब बोले l
"जी.. जी नौकरी l"
"बम्बई आ सकते हो?  29 को एक नाटक कर रहे हैँ l"
बिना कुछ सोचे रोशन ने बोल दिया,  "आ जाऊँगा,  सर l"
"परसों पहुँच जाओ l मैं कल पहुँच रहा हूँ l" गुरु ने फरमान सुना दिया l
"जी" कहकर रोशन सोच मे पड़ गया,  " मुझे भी तो कल ही निकालना पड़ेगा l साहब की तरह हवाईजहाज़ से थोड़े ही जा सकता हूँ मैं l"
"बाकी बातें मुंबई में होंगींl" सुलेमान साहब ने फ़ोन काट दिया l
दो दिन में बम्बई पहुँचना ही इकलौती समस्या नहीं थी l 31 को रोशन की शादी थी यानि शो से दूसरे दिन l कार्ड छप चुके थे l लव अर्रेंज मैरिज थी l ऐसी शादियों में लड़की वाले आखिरी क्षण तक आश्वस्त नहीं होते हैँ खासकर तब जब लड़का खस्ता हाल हो l दिशा के बाऊ जी कहीं ये ना सोच लें कि लड़का शादी से पहले ही भाग गया l
घर जाकर रोशन ने पिता जी को सब बता दिया l उन्होंने तीन चार मिनट सोचा और पूछा,  "शादी पर तो आ जाओगे ना? "
"जी,  पक्का आ जाऊँगा l"
"जाओ,  यहाँ मैं संभाल लूँगा l बस आ जाना l"
जेब में साढ़े सात सौ रूपये पड़े थे l रोशन बिना रिजर्वेशन ही गाड़ी में सवार हो गया l सुलेमान साहब के ऑफिस पहुँचा और अपनी शादी का कार्ड सामने रख दिया l
"किसकी शादी है? " 
"जी मेरी "
"कितने बरस के हो? "
"छब्बीस "
"छब्बीस में शादी कर लेता है कोई? "
रोशन कुछ ना बोला l
"लड़की कौन है? "
"शंभु जी की बेटी "
सुलेमान साहब ने आधी नाक पर रखा चश्मा उतारा,  "क्या..कौन से नंबर की? "
"जी तीसरे "
"मियाँ,  दुनिया वाकई बहुत छोटी है यार l कितने बरस साथ काम किया है हमने और शंभु जी ने l फ़ोन मिलाओ उन्हें l" 
सुलेमान साहब ने शंभु जी से आधा घंटा बात की l पिछले सारे सालों की कसर निकाल रहे हों जैसे l शंभु जी को बता भी दिया कि उनकी बेटी का दूल्हा 29 तक तो बम्बई में ही रहेगा l अंत में आश्वासन भी दे दिया कि दूल्हे को 31 तक लखनऊ पहुँचाना उनकी जिम्मेदारी l
"पागल हो तुम l बताते तो शादी है तुम्हारी l अगले शो में आ जाते l ये कोई आखिरी नाटक है हमारा? "
"मौका नहीं छोड़ना चाहता था ,  सर "
"चलो फिर,  जुट जाओ l तूफानी शो होना चाहिए l"

शो हिट रहा l रोशन 31 की सुबह लखनऊ  पहुँच गया l अम्मा ने घर सिर पर उठा रखा था l शंभु जी के पेट में हौला था l दो घंटे में हल्दी भी चढ़ी,  मेहंदी भी लगी और कंगना भी बंधा l सुलेमान साहब बारात में घोड़ी के साथ-साथ चल रहे थे l शिष्य के लिए तो  हर गुरु भगवान होता है पर गुरु के लिए भी कुछ शिष्य खास होते हैँ l



नोट : गोपनीयता बनाये रखने के लिए नाम बदले गए हैं 



गुरुवार, 16 अगस्त 2018

एक महान नेता का निधन





            एक महान नेता का निधन



बीती शाम एक महान राजनेता का निधन हो गया. राजकीय शोक और सरकारी छुट्टी घोषित हो गई.
टीवी चैनल उनकी महानता बांचकर टीआरपी का घमासान लड़ रहे थे.
लोगों ने देर तक टीवी देखा. अगले दिन छुट्टी जो थी. लोग टीवी आजकल कानों से देखते हैं, आखें तो व्हाट्सप्प और फेसबुक में उलझी होती हैं.
हम लेखक तो आधे अधूरे ही बने हैं अभी पर insomnia पूरी तरह हो चुका है. चाय की लत है. लूले लंगड़े विचार पालते रहते हैं, दार्शनिक जैसा जो दिखना होता है. छुट्टी थी पर हम साढ़े पाँच बजे ही बिस्तर छोड़ रसोई में घुस गए चाय बनाने को. सुबह की पहली चाय बालकनी पर खड़े होकर पीने का मज़ा ही कुछ और है. किसी को कहते सुना था की लोगों को observe करने से लिखने के लिए मसाला मिल जाता है .
सड़क शुक्रवार जैसी न थी. इत्मीनान हाथों में लेकर रीझ रही थी जैसे किसी भूखे को कोई अमीर सौ का नोट पकड़ा गया हो. शायद लोग सो रहे थे. छः बजे बगल के पंसारी वाले गुप्ता जी की दुकान का शटर घड़घड़ा के खुल गया.
दस मिनट बाद वहाँ मिस्टर जोसफ सिगरेट पीने आये और दुबे जी दूध लेने. चर्चा होने लगी. कान लगाकर लोगों की बातें सुनना भी तो लेखकों को भाता है.
"अरे, वो तो पहले ही मर गए थे, बस डिक्लेअर नहीं किया था. पंद्रह अगस्त थी न" दुबे जी बोले. जैसे सरकार सारी जानकारियाँ उनसे साझा करती हो.
"चलो, आज छुट्टी तो मिली." मिस्टर जोसफ ने सिगरेट का लम्बा काश भरते हुए कहा.
सामने से एक परिवार तैयार होकर बस स्टॉप की और जा रहा था.
"हाँ, देखो, लोग तो घूमने निकल पड़े," दुबे जी ने टिपण्णी की. मर्दों में भी छीटाकशीं के गुण होते ही हैं .
"छुट्टी हुई है की ज्यादा से ज्यादे लोग जाकर पुण्य-आत्मा को श्रद्धांजलि दें. लोग छुट्टी मना रहे है," गुप्ता जी चर्चा में कूद आये.
"या फिर टीवी पर देखें और उनके अच्छे काम याद करें," जोसफ ने राय दी जो बिलकुल उनकी सिगरेट के आखिरी कश की तरह औपचारिक थी. ने अंदर कुछ गया, न बाहर कुछ आया.
"उससे तो टीवी वालों की टीआरपी बढ़ेगी, किसी और को क्या मिलेगा? छुट्टी होनी ही नहीं चाहिए. महान नेताओं की मृत्यु पर काली पट्टी बांधकर काम किया जाना चाहिए. बल्कि एक घंटा एक्स्ट्रा काम करना चाहिए ."
दुबे जी कह ही रहे थे की सामने बालकनी से मिसेस दुबे चिल्लाईं, "बेसन भी ले आइयेगा. नाश्ते में पकौड़े बना लेंगें,"
दुबे जी सकपका गए. मुड़े और गुप्ता जी से बोले, "देना, गुप्ता जी, एक किलो बेसन,"

सोमवार, 9 जुलाई 2018

जीवन का अर्थ



                           

                                                                     जीवन का अर्थ 





अपना-अपना जीवन 
हम सब को 
सीधी पंक्तियों सा लगता है..

सीधी पंक्तियाँ
    सभी के लिए अर्थरहित,
और एक चाह,
    कि कोई तो हो, 
जो देख सके 
इनमें एक रचना
पूर्णतः अर्थपूर्ण ...

यही तलाश ही तो है
जीवन का सत्व 
रिक्तता ही तो है 
जीवन का अर्थ 
क्षणों के साथ आतीं
मरतीं सासें
मोमबत्ती सा जलता
घुलता शरीर,
और एक मन...
हर पल कुछ तलाशता,
बेचैन, उत्सुक, हैरान...
ले चलता है जीवन को,
वक्रता की और,
और जब पूर्ण होता है व्रत 
बीच में से रिक्त
तब मर जाता है जीवन...

कुछ नहीं है जीवन
बस शुन्य मात्र 
और जो समझ लेता है यथार्थ 
वो कहलाता है पागल....

बुधवार, 20 जून 2018




                               मैं अब प्रेम की कवितायेँ नहीं लिखता




मैं अब प्रेम की कवितायेँ नहीं लिखता 
नहीं, भावनाएँ नहीं मरीं हैँ मेरी 
बस उनका मोल समझ गया हूँ 
नहीं चाहता कि स्याही में सानकर 
कागज में परोस कर 
उन्हें सब के सामने रख दूँ.




मैं अब प्रेम की कवितायेँ नहीं लिखता,
नहीं, चाँद-सितारों की उपमाएँ 
बेमानी नहीं लगती मुझे,
पर आपकी प्रेयसी 
अतुलनीय भी तो हो सकती है,
क्यों मैं उसकी तुलना करूँ.



मैं अब प्रेम की कवितायेँ नहीं लिखता,
नहीं, ज्यादा पढ़-लिख नहीं गया हूँ,
पर थोड़ी परिपक्वता कमा ली है,
सोचता हूँ, मेरा प्रेम बस मेरा है,
ख़ुशी-उदासी, उमंग-मायूसी,
जो भी पाऊँ, क्यों बाँटु?



मैं अब प्रेम की कवितायेँ नहीं लिखता,
नहीं, मैं कोई असफल प्रेमी नहीं हूँ,
प्रेम की मेरी परिभाषा कुछ अलग है,
शब्दों की चाशनी में लपेटकर,
कहकर, लिखकर या जताकर,
अपनी भावनाओं का बाजार क्यों लगाऊँ ?



रक्त और विधि के गढ़े रिश्तों के बीच,
प्रेम, मन का बनाया 
एक सुन्दर रिश्ता होता है,
अच्छा हो, बुरा हो,
अपेक्षाओं पर खरा उतरे, न उतरे,
उसे मनोरंजन का सामान क्यों बनाऊँ ?

इसलिए, मैं अब प्रेम की कवितायेँ नहीं लिखता....

मंगलवार, 8 मई 2018

बात उन दिनों की है


                         


                            बात उन दिनों की है 



वो दँसवी के बोर्ड वाला साल था। हमारे चेहरे पर पहला मुँहासा उग चुका था। सो, स्कूल यूनीफार्म की नीली पेंट फैशन वाली हुआ करती थी- आगे दो चुन्नटें, घुटनों पर ढीली और तंग मोरी ।
 ग्वालियर की हवा अजीब ही है. एक तरफ से भिंड के डाकुओं की दहशत और दूसरी तरफ मुरैना की गज़क की मिठास. हम  बहुत जल्दी ढलते थे हर माहौल में. 

" मैंने प्यार किया " उस ही साल रिलीज़ हुई थी। दोस्तों के साथ वीसीआर पर देखी थी हमने यह फिल्म, लास्ट वर्किंग डे की  आधी छुट्टी पूरी होने के बाद।

भाग्यश्री का पोस्टकार्ड  हमारी किताबों में भी रहता था । "नो सारॅी, नो थैंकयू" और "दोस्ती की है तो निभानी तो पड़ेगी" सब की जुबान पर रहते थे ।


पर इस पिक्चर के आने से पहले भी स्कूल के दोस्ती के रिश्तों में सच्चाई और ईमानदारी हुआ करती थी। लोग स्लैम बुक में दिल उड़ेल दिया करते थे। कोई लड़की राखी बाँध दे तो सही में बहन हो जाती थी और फिर कहीं भी चले जाओ कुछ सालों तक तो राखी हर साल पहुँचती थी डाक से।

एक लड़की हमारी भी बहन बनी थी उस साल-शालिनी।

तीस साल बीत चुके हैं l हमारा व्यवहार उसके साथ कैसा था, यह तो शायद वह ही बेहतर बता पाए लेकिन वो बिलकुल सगी बहनों जैसी थी l वह वहीँ पास में ही रहती थी और हम स्कूल से दूर l  सो कई बार उसके घर भी चले जाया करते थे . 

पूरे स्कूल में भाषणबाजी में हमारा कोई सानी था तो हमारा गिठ्ठा दोस्त आलोक ।
इंटरहाऊस काम्पटीशन्स में कभी वो जीत जाता कभी हम । पर उससे हमारी दोस्ती में कभी दरार न आई । शायद दिमाग ज्यादा खुले होते थे तब।


एक रोज़ लंच के बाद कल्चरल एक्टिविटी इन-चार्ज, सौदान सिंह सर ने फरमान सुना दिया कि छुट्टी के बाद हमें और आलोक को उनके साथ सिंधिया कन्या विद्यालय जाना है ,एक वाद-विवाद प्रतियोगिता में भाग लेने के लिए।कह दिया की किसी दोस्त के हाथ घर में संदेसा भिजवा दें l  पर हमारी  चिंता वो नहीं थी l हमें तो भूख बहुत लगती थी और हम जानते थे की स्कूल की तरफ से कुछ मिलने वाला है नहीं l शालिनी समझ गयी l छुट्टी हुई तो हमें रुकने को कहकर फ़टाफ़ट अपने घर गई और एक टिफिन पैक कर लाई.


सौदान सिंह जी ने थ्रीव्हीलर बुला लिया था l हमने टिफिन सीट के पीछे लगे तख्ते पे रख दिया l सफर लम्बा था l सिंधिया स्कूल पर उतरे तो टिफिन लेना ही भूल गए l एल्युमीनियम के उस टिफिन में शालिनी न जाने क्या लाई थी पर उसकी भावनाएँ हमें अभिभूत कर गयी थी l 

बोर्ड की परीक्षाओं के बाद मैं ग्वालियर से दिल्ली आ गया l कुछ सालों तक शालिनी की राखी आती रही पर रिश्ते एक तरफ से थोड़े ही निभते हैं l 

तीस साल बाद फेसबुक पर मिली शालिनी. वो वैसी ही थी. और हम भी वैसे ही थे. उसकी और हमारी भावनाएँ भी वैसी ही थीं. पर जिंदगी ने हमें शायद और रूखा कर दिया था. हम दूसरों से ये उम्मीद और भी ज्यादा करने लगें हैं की वो समझ जाएँ बस. हमें कहना न पड़ें. फिर चाहे गलत समझें या सही. 

फ़ोन पर लम्बी बात नहीं कर पाता मैं। व्हाट्सएप से नफरत है मुझे. सब दोस्तों को शिकायत रहती है । ऐसा नहीं की दोस्तों और रिश्तों की कीमत कुछ भी नहीं है मेरे लिए ।पर मैं शायद कुछ अलग हूँ । काफी सारे दोस्त ये बात समझते भी हैं और जो नहीं समझते शायद यह सच्ची कहानी उन्हें समझा दे । 


#हिंदी #संस्मरण #ग्वालियर #राखी #स्कूल 

शनिवार, 17 मार्च 2018

पलाश के फूल






                                पलाश के फूल









बैंक की सीढ़ियाँ उतर फुटपाथ पर कुछ कदम ही आगे बढ़ा था कि सड़क किनारे लगे पलाश के पेड़ से टूट कर दो फूल मेरे आगे गिरे। मैं ठिठक गया। बचपन से ही बड़ा लगाव है मुझे पलाश के फूलों से। रंग ऐसा होता है मानो सुबह, नहा-धोकर पूजा की थाली लेकर खड़ी हो। आकार ऐसा जैसे पर्वतों के बीच कोई मनोरम घाटी आशाओं का अम्बार लिए निमंत्रण दे रही हो। इन फूलों की उपस्थिति इतनी भव्य और प्रभावशाली होती है कि   पलाश के पेड़ को इन फूलों के बिना, केवल वनस्पतियों का वृहत ज्ञान रखने वाले ही पहचान पाते होंगे। मैं आज तक भी बस फूलों को ही  पहचान पाता हूँ। लाल और हरे का जैसा विहंगम समागम पलाश में होता है वैसा तो तोते में भी नहीं होता।





"जिस  पेड़ का अस्तित्व ही उसके फूलों से हो, उसे क्या उन्हें कभी  अलग करना चाहिए ? कितना कृतध्न पेड़ है। शाख पर ही सूख कर झड़ जाँए तो क्या चला जाएगा ।" मैं सोच रहा था।


मैं गिरे हुए फूलों को उठा पाता, एक गाड़ी के पहिये ने उन्हें निर्ममता से कुचल दिया। असामयिक मृत्यु हो गई दोनों की। कुछ क्षण और निहारा मैंने उन्हें , फिर आगे बढ़ गया। 









 सही तो हुआ। उन फूलों का परित्याग उस पेड़ ने किसी कारण से ही किया होगा। मौत, परिवार द्वारा त्याग दिए जाने से बड़ा कष्ट नहीं है। न तो इन्हें कोई गुलदस्ते में सजाता और न ही जूड़े में। अच्छा हुआ, जल्दी मुक्ति मिल गई।

गुरुवार, 7 दिसंबर 2017

सर्दियाँ -तब और अब




                     सर्दियाँ -तब और अब





तब गली से न मोटर साइकिल गुजरती थी
न घमंड भरा हार्न बजाती धुआँ की गाड़ियाँ
सूरज भी तब खुजमिजाज सा था
पुचकारता था, चुटकुले सुनाता था 
धूप बहुत लाड़ लड़ाती थी
हवा काली कलूटी नकचड़ी नहीं थी



खड़ंजे वाली साफ गली में

फुरसत की सुबह होती थी
प्रोजेक्ट और होमवर्क सारी 
छुट्टियाँ नहीं पी जाते थे।
सूरज का बुलावा आते ही
चारपाई पर दादाजी के साथ 
गली की रौनक बन जाते थे। 

गन्ना चूसते मीठे सवाल करते रहते
पर दद्दा के कान  रेडियो पर लगे होते थे
मंजुल की हिन्दी की कमेन्टरी
गावस्कर और विश्वनाथ की रेंगती बैटिंग
बाथॅम और बाबॅ विलीस की
कुटिल मुस्कानें रेडियो पर भी नजर आती थी
तब हर ओवर के बाद मशहूरियाँ 
नहीं आती थीं
हाँ, हर ओवर के बाद दद्दा
हमारे उल्टे सवालों का
पुल्टा जवाब देते थे



कटोरी में धँसा स्टील का गिलास 

भर कर जब दद्दा की चाय आती थी
आधी कटोरी फूंक मिला कर 
गुनगुनी चाय मुझे मिल जाती थी 
खबरें सारी बता कर भी
अखबार खाट पर पड़ा रहता था
जानता था, मूँगफली जब खाई जाएगी
छिलके उसे ही समेटने  होंगे।


तब मनमुटाव ज्यादा नहीं जी पाता था
इमोटीकानॅ असली होते थे
मुस्काने सस्ती होती थी
रिश्तों को गहनों से भी ज्यादा 
सहेजा जाता था।
पड़ोसी कभी कभी दिखने वाले
अंकल आंटी नहीं
चाचा चाची होते थे।
कंपकंपाने वाली ठंड का गुस्सा 
मन में प्यार की गरमाहट से
पिघल जाता था।




अब गुड़ की शकरकंदियाँ नहीं बनती हैं

अब जाड़ों की धूप की बाट 
जोहती चारपाइयाँ नहीं बिछती हैं।
अब दादा-दादी को रखने वाले
बड़े बड़े दिल नहीं होते हैं।
अब पिता की चारपाई पर
बेटे पायते नहीं बैठा करते हैं 
अब बस बदरंग सी सर्दी होती है
गुलाबी जाड़े नहीं होते हैं।
तब ठिठुरते तन को 
मन गरमाहट देता था
अब तन मन दोनों ठिठुरते हैं
ब्लोअर चलाने पड़ते हैं।

शुक्रवार, 27 अक्टूबर 2017

सत्यनारायण भगवान की कथा




सत्यनारायण भगवान की कथा



अर्सा हो गया

मम्मी पापा व्रत लेते थे
सत्यनारायण भगवान की कथा का
हम भाई बहनों में से
किसी एक के लिए।
हम चार थे
सो कथा जल्दी-जल्दी होती थी।
कहानी हमें रट गई थी
कसार पर चार चम्मच चरणामृत
और कटे हुए केले का प्रसाद 
बहुत भाता था।
फिर सब बदल गया
हम बड़े हो गए
अब घर में काम
हमारी मर्ज़ी से होते थे

हम मम्मी पापा जितने
आस्तिक भी नहीं हैं।
या शायद हमें अपने गृह 
कभी भारी लगे ही नहीं ।

उन्हें तो शायद
मम्मी-पापा ने इतना शांत 
कर दिया था कि
वह हम पर 
कभी कुपित हुए ही नहीं  
आज भी सत्यनारायण भगवान नहीं
बड़ी सी कढ़ाई में माँ  भूनती थी 
बस उस कसार की याद आ गई
आज मम्मी पापा की हमारे लिए
फिक्र की याद आ गई।

सोमवार, 28 अगस्त 2017

रामलीला








                                रामलीला 






कल ऐसे ही अपने विधार्थियों से पूछ बैठा कि उनमें से किस-किस ने रामलीला देखी है। उनके उत्तर सुन कर बड़ा आश्चर्य हुआ। कुछ ही ने रामलीला देखी थी वह भी एक या दो दिन । हाँ, टीवी पर रामायण बहुत लोगों ने देखी थी।
दुख हुआ कि एक परम्परा और सास्कृतिक धरोहर मिटने के कगार पर है। इस बात का भी क्षोभ हुआ कि हमारी नई पीढ़ियाँ कितनी शानदार चीजों से वंचित कर दी गई है।



                              




फिर मन में प्रश्न उठे कि क्या रामलीला की  प्रासंगिकता रामचंद्र जी के जीवन मूल्यों को नई पीढ़ी तक पहुँचाने मात्र ही है? यदि हाँ, तो टीवी पर ही देख लेने में क्या बुराई है?

मैं रामलीला को किसी विशेष धर्म के प्रचार व प्रसार के प्रयास के रूप में नहीं देखता।  ऐसे आयोजनों से समाज में उत्साह और उल्लास रहता है। लोग आनंद में रहते हैं तो खर्च करते हैं। सभी का भला होता है।
सोच के देखिए पूरे पैंतीस दिन रौनक- सड़क पर भी और मन में भी। चहल-पहल,  सजे हुए पंडाल, लाउड स्पीकर पर ठुमक चलत रामचंद्र, बाजत पैंजनिया 
बजता रहता है, दशरथ का विलाप, जटायु का करहाना,  रावण की गरजना और अट्टहास गूँजता है मनोरंजन की पराकाष्ठा होती है। फिर यह चिंतन उल्टी चाल चलते हुए मुझे मेरे बचपन में घसीट ले गया।



हमारे मोहल्ले में प्रति वर्ष रामलीला का मंचन होता था। कनागत खत्म होते ही मंदिर में रामलीला की रिहर्सल शुरू हो जाती थी। मुख्य पात्र निश्चित रहते थे और बहुत से लोग एक से अधिक भूमिकाएँ करते थे।
अक्टूबर में हल्की ठंड पड़ने लगती थी। बिना बाजू का स्वेटर माँ जबरदस्ती पहना देती थी। मुझे पहले भेजा जाता था कुर्सियाँ घेरने के लिए। आठ बजे लगभग मंच का पर्दा उठता था। 


उल्लास और उत्साह का माहौल रहता था। पंडाल के बाहर खोमचों की कतारें शाम से ही लग जाया करती थीं। मूंगफली, चाट-पकौड़ी, आइसक्रीम, गुब्बारे, धनुष-बाण, गदा, रामायण के पत्रों के मुखौटे, नकली मूँछे, और हाँ, सरकंडों वाला साँप, याद है न, जो बड़ा और छोटा हो जाता है , सब मिलता था / रामलीला देखते रहिये, मुँह चलाते रहिये / शायद पूरे दिन में वो इतना ना कमा पाते हों जितना शाम से रात तक कमा लेते थे। उन लोगों पर रामचंद्र जी की कृपा उन दस दिनों में खूब होती थी।



                           





नुक्कड़ के दर्जी की दुकान पर काम करने वाला पतला-दुबला लड़का आसिफ सीता का रोल करता था। गजराज भैया  दूध बेचते थे । शरीर और चेहरा भारी-भरकम था। दो महीने पहले से ही मूँछे बढ़ानी शुरू कर देते थे। ढेढ़ इंच चौढ़ी और नथुनों के दोनों ओर चार-चार इंच लम्बी, घनी और किनारों पर दो-तीन बार घूमती हुई काली स्याह मूँछ देखकर छोटे बच्चे तो डर ही जाया करते थे। उनका दमदार ठहाका और कंपा देने वाली आवाज उन्हें साक्षात लंकापति रावण का स्वरूप देती थी। बाकी सब कुछ तो किराए पर आता था लेकिन रावण की पूरी वेशभूषा वे अपनी पर्सनल खरीद कर लाए थे किनारी बाजार से। 
पीछे वाली गली में रहने वाले देवदत्त भाई दशरथ, परशुराम और सुग्रीव , तीनों पात्र बखूबी निभाते थे। उनके दशरथ विलाप के अभिनय पर ईनामों की झड़ी लग जाती थी। ग्यारह, इक्कीस, इक्यावन और कभी कभी तो एक सौ एक भी। गज्जू भाईसाहब पर भी खूब रुपए बरसते थे। राम-सीता विवाह में लोग दिल खोल के कन्यादान देते थे। कलाकारों की यही आय हुआ करती थी।





                                           




रामायण में मेरा सबसे प्रिय पात्र लक्ष्मण  है। काफी सालों तक यह इच्छा भी रही कि एक बार यह पात्र रामलीला में करूँ पर कभी किसी पर जाहिर करने का साहस नहीं हुआ। मोहल्ले की रामलीला का  लक्ष्मण परशुराम संवाद मैं कभी नहीं छोड़ता था। कल्पना करता रहता था कि मैं यदि लक्ष्मण की भूमिका मैं होता तो कैसे करता। 

जहाँ साधारण लोगों को खुशी मिलती थी, गरीब लोगों को अतिरिक्त आय के अवसर मिल जाते थे। इससे न सिर्फ हिन्दू बल्कि मुस्लिम समुदाय के लोग भी होते थे। बच्चों को हमारे देश की परंपरा से साक्षात्कार होता था। कलाकारों को अपनी प्रतिभा दिखाने के लिए मंच मिलता था और जीवन की एकसारता में सकारात्मक परिवर्तन आता था। वर्ष का एक तिहाई भाग उमंग और उल्लास के वातावरण में कटे तो इससे अच्छा क्या हो सकता है।


रामलीला अब भी होती है लेकिन हर मोहल्ले में नहीं। आज के व्यस्त जीवन में दूर जाकर दो-तीन घंटे रामलीला देखना असम्भव है और हम लोगों की अरुचि के कारण के कारण यह हर मोहल्ले में नहीं हो पाती/ लोग इच्छुक तो होते हैं परन्तु उनके पास न धन होता है, न कलाकार और न ही दर्शक/

रामलीला श्रवणकुमार की मातृ-पितृ भक्ति से आरम्भ होती है और भारत मिलाप पर समाप्त होती है / दोनों ही बड़े प्रेरणादायक प्रसंग हैं / है न ? टीवी पर रामायण का सार दूसरे कार्यक्रमों में कहीं खो जाता है/ मंचित रामलीला की अनुभूति कुछ अलग ही होती है/ 








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