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गुरुवार, 2 मार्च 2017

संस्कार





                                  संस्कार




सात कोस नंगे पाँव चले थे हम। परिक्रमा  में कच्चा रास्ता कम ही मिला था। वहाँ भी काँटों। ने कठिन परीक्षा ली थी। पक्की सड़क पर कंकड़ तलुओं को प्रताड़ित करते रहे थे। चार कोस बाद ही छाले हो गए थे। 

परिक्रमा यूं तो काफी बार लगाइ थी किंतु इस बार भागमभाग थी। अपनी कार थी नहीं। कुछ दिन पहले ही बेची थी और दूसरी ले नहीं पाए थे।


पिताजी ने किराये पर गाड़ी कर ली थी। ड्राइवर उम्र में पिताजी से दो चार साल ही कम होगा । शायद पार्क में मिलते-जुलते थे उनसे। मेरा एक दोस्त भी सपरिवार चलने का इच्छुक था।
गाड़ी में जगह थी इसलिए मैंने हाँ कर दी।


रावानगी से दो घंटे पहले ही पिता जी ने बताया कि गाड़ी नॅान-एसी है।
'जरुरतमंद है बेचारा।स्कूल के बच्चों को लाता लेजाता था।बीमारी की वजह से काम छूट गया।' हमारे बिगड़े चेहरे देखकर उन्होंने कहा।
न कुछ कह सकते थे न कुछ कर सकते थे।


जून के महीने में बिना एसी के मारुति वैन में सफर मजबूरी में ही किया जा सकता है। परिवार को  सैर सपाटे पर ले जाने के लिए नहीं। 


गाड़ी काफी खस्ता हाल थी। मैं समझ नहीं पा रहा था कि हम अपना उद्धार करने के लिए परिक्रमा को जा रहे थे या परोपकार करने को। 


साढ़े तीन घंटे का सफर आरामदायक तो नहीं था पर सबके साथ हँसते बोलते कट गया।


परिक्रमा शुरू करने को हुए तो ड्राइवर साहब ने अल्टीमेटम दे दिया, 'सुबह सात बजे तक आ जाना। मुझे बारह बजे तक हर हाल में दिल्ली पहुँचना है।'


मेरा दोस्त जानता था कि मैं चाहते हुए भी कुछ कह नहीं पाउँगा। सो वह चुप नहीं रहा।
'दादा, ऐसी एमरजेंसी थी तो आए ही क्यों। मना कर देते तो हम किसी और को ले आते।'
पिता जी ने बीच में ही बोल दिया,' कोशिश करेंगे।' हम जानते थे और शायद ड्राइवर भी कि उनका मतलब है कि हम पक्का सात बजे तक पहुँच जाएंगे फिर चाहे हमें भाग भाग कर ही परिक्रमा क्यों न लगानी पड़े।


परिक्रमा शुरु हुई । माँ-पिताजी ने रिक्शा ले  ली थी। लगभग आठ घंटे थे हमारे पास। छड़े होते तो आराम से पाचँ साढ़े पाचँ घंटों में इक्कीस किलोमीटर टाप जाते।पर बच्चों के साथ आठ घंटे भी कम थे।फिर सड़क नापने को तो गए नहीं थे हम। बहुत सी जगह रुकना पड़ता है।


खैर, सुबह साढ़े सात बजे हम ड्राइवर साहब के पास पहुँच गए थे। बस चाय पीने की इच्छा ड्राइवर को जताई। उन्होंने जवाब दिए बिना गाड़ी दौड़ा दी। हमें लगा शायद हाईवे पर रोकेंगे। हम सब्र रखे बैठे रहे। हाईवे पर मुड़ते ही मैंने कहा, 'किसी ठीक सी जगह पर रोक लीजिएगा। चाय पी लेंगे। बच्चे भी कुछ खा लेंगे।'


'गाड़ी तो अब दिल्ली जाकर ही रुकेगी।' वह ऐसे बोला जैसे हम उसकी नानॅस्टाप रोडवेज़ बस में बैठे हों।


'रोक ले, भाई। आधे घंटे की बात है।' पिता जी ने विनती करते हुए कहा।
'बाऊजी, आधे घंटे तो आप पहले ही देर कर चुके हो। अब और नहीं हो सकता।' ड्राइवर साहब कुछ ज्यादा ही अक्खड़ थे।
पिता जी तो चुप हो गए लेकिन मुझसे रहा नहीं गया।
'क्यों नहीं रोकोगे आप गाड़ी? ये सारी बातें आपको पहले बतानी चाहिए थीं। हमें ठीक लगता तभी आते हम।' मैंने बोल दिया।
ड्राइवर ने अनसुना कर दिया और गाड़ी चलाता रहा।


'आप गाड़ी रोकिये। यहीं रोकिये।' मैंने थोड़ा तैश में आकर कहा।


'हमारा काम लाना लेजाना था। बीच बीच में रुकते-रुकाते थोड़ा ही चलेंगे हम।'
'बड़े अजीब आदमी हो। आप पर तरस खाकर ले आए थे आपको। आपकी आदतें और स्वभाव बता रहा है कि आपकी ऐसी हालत क्यों है।' गुस्से ने मेरे लहजे में कड़वाहट घोल दी थी।


कुछ जवाब आता उससे पहले ही ड्राइवर के पास बैठे पिता जी ने गर्दन घुमाई और कहा,' होल्ड योर टंग।'


मैंने माँ की तरफ देखते हुए कहा, 'क्या गलत कहा मैंने?'
'बुजुर्गों से ऐसे बात की जाती है क्या?यह ही सिखाया है हमने तुम्हे ?'


'अंकल जी, पहले तो आराम से ही बोला था। ये भी कहाँ सुन रहे हैं।' 
मेरा दोस्त बोला।


'हम तो चलिये रह लेंगे चाय के बिना पर बच्चे भी तो हैं।'


'बलबीर, तू गाड़ी रोक।' पिता जी गुस्से से बोले। 


ड्राइवर ने ब्रेक लगा दिए।

 'अब तू तब चलेगा जब ये तुझसे माफी मांग लेगा।' पिता जी ने कहा और उतरकर खड़े हो गए।

मुझे ड्राइवर से माफी माँगनी ही पड़ी। गुस्से ने थकान भी चूस ली थी। रास्ते भर कोई कुछ नहीं बोला। 
पिता जी ने संस्कारों की दुहाई दी थी लेकिन मैं समझ नहीं पा रहा था कि मेरी गल्ती क्या थी।


पिता जी अब नहीं हैं लेकिन ये वाकया याद करके गुस्सा नहीं आता | अच्छा लगता है और सीख मिलती है कि सिद्धांतों और संस्कारों की कोई कीमत नहीं होती | वो अपनी जगह पर ही रहने चाहिए चाहे कैसी भी परिस्तिथि हो |

रविवार, 7 अगस्त 2016

मनीआर्डर




                                                                               मनीआर्डर



नोट :- कहानी १९८० के आस-पास घटित होती है |



उस दिन फिर चार तारीख थी। पिछले तीन महीने से इस ही तारीख को बेनामी मनीआर्डर आ रहा था। बेनामी इसलिए क्योंकि जो नाम लिखा था वो मेरे परिचितों में किसी का नहीं था | हर बार एक ही संदेश लिखा होता था "लौटाना मत। तुम्हारे दिए एक कर्ज की किश्त मात्र है यह"।

 संदेश पढ़कर भी मैं रुपये रखना नहीं चाहता था परन्तु घर की जरूरतों के कारण विवश हो जाता था। मेरा वेतन एक हजार रुपये मासिक था । इससे पाँच बच्चों के साथ गुजारा मुश्किल से होता था। हर महीने कुछ रुपये उधार लेने पढ़ते थे। पत्नी के ताने कर्जदारों के तकादों से भी ज्यादा भयभीत करते थे। पिछले तीन महीनों से हजार रुपए अतिरिक्त आने से घर की परिस्थिति सुधर रही थी। काफी कर्ज़ चुक गया था और पिछले महीने मालती को साड़ी और बच्चों को एक -एक जोड़ी कपड़े दिला दिए थे।

मैं इतना ही जानता था कि यह मनीआर्डर भोपाल से आ रहा था। कौन भेज रहा है, पता नहीं चल पा रहा था। भोपाल में मेरा कोई परिचित नहीं था और न ही मैं  वहाँ कभी गया था।

इस बार मैं स्वार्थी और लालची बन मनीआर्डर की बाट जोह रहा था। "कुछ महीने और आता रहे बस। सब कुछ ठीक हो जाएगा।" मैं सोच रहा था।

लंच से कुछ पहले मनीआर्डर आ गया। डाकिया साथ में एक और पत्र लाया था- निमंत्रण पत्र | भोपाल में होने वाले कवि सम्मेलन का। शायद समय आ गया था कि मैं उस अज्ञात शुभचिंतक का पता लगाऊँ।

मैं पहले भी भोपाल जाना चाहता था लेकिन माल्ती को बताने के लिए कोई कारण नहीं था मेरे पास। इस निमंत्रण ने यह दुविधा दूर कर दी थी। 
कभी-कभी ही मिलता था पारिश्रमिक वाले कवि सम्मेलन का न्योता। मुझसे ज्यादा खुशी माल्ती को होती थी ऐसे अवसरों पर। कवियों से विवाह होना किसी भी स्त्री के लिए बड़े दुर्भाग्य की बात होती है और उनके साथ निभाना उनका साहस होता है।
कवि सम्मेलन रात को था लेकिन मैं सुबह ही भोपाल पहुँच गया। रेलवे स्टेशन से सीधा प्रधान डाकघर गया। मनीआर्डर की पर्ची दिखा कर जानकारी लेनी चाहिए लेकिन सरकारी कर्मचारी मदद करना अपनी तौहीन समझते हैं।

बड़े मान-मनुहार और बीस रुपये चुकाए तब जाकर भेजने वाले का नाम व पता मिला।

"मृगनयनी नाम की महिला चार महीनों से हमारी संकटमोचन बनी हुई थी। उनसे मिलना हर लिहाज से अनिवार्य था।" मैं दृढ़ निश्चय कर चुका था उससे मिलने का,  फिर चाहे मुझे कवि सम्मेलन छोड़ना क्यों न पड़े। 


टेम्पो पकड़ कर मैं उस पते पर पहुँचा परन्तु दरवाजे पर लटके बड़े से ताले ने ठेंगा दिखा दिया मुझे । मैंने थोड़ी देर प्रतीक्षा की। फिर सोचा पड़ोसियों से पूछता हूँ। 
बाईं ओर सटे मकान का दरवाजा खटखटा कर पूछा तो जानकारी मिली कि वह मकान काफी समय से बंद है और वहाँ मृगनयनी नाम की कोई महिला नहीं रहती थी। मैंने पूछा, "क्या यह मकान पिछले चार माह से बंद है?"
उन्होंने कहा, " पूरा साल होने को है।"
मैंने फिर पूछा, "उनका कोई और पता भी है।" उन्होंने उत्तर दिया, "घर का तो नहीं, पर हाँ, सुकृति प्रकाशन उन्हीं का है। बड़े बाजार में दफ्तर है।"

मैं बड़े बाजार को रवाना हो लिया। आश्चर्य हो रहा था कि इस युग में भी गुप्त परोपकार करने वाले हैं। गुत्थी सुलझ नहीं रही थी और मेरी उत्सुकता बढ़ती जा रही थी। लाभ मिलना न मिलना अलग विषय था परन्तु मेरे प्रति इतनी अधिक दया और स्नेह  रखने वाली स्त्री का परिचय न  मिलना कौतूहल मचा रहा था। मैं कवि हूँ। निश्चित ही कपटी नहीं हो सकता। कवि-हृदय में मर्म और संवेदना तरल अवस्था में होती है। वह स्वयं उन्हें बहने से रोक नहीं सकता।


बड़े बाजार में भी निराशा मेरी प्रतीक्षा कर रही थी । शनिवार होने के कारण सुकृति प्रकाशन का दफ्तर बंद था। सोमवार तक भोपाल में रूकना मेरे लिए संभव नहीं था। 
अब तक मिली निराशा की समीक्षा करते हुए मुझे कवि सम्मेलन का पारिश्रमिक छोड़ना मूर्खता लगी।  आयोजकों द्वारा कवियों के लिए आराम गृह की व्यवस्था की गई थी। मैंने वहीं जाना उचित समझा।


भोपाल से असफल लौटते हुए मेरा मन मुझे कचोट रहा था परंतु मैं विवश था। 

माल्ती पाँच सौ रुपए का पारिश्रमिक और घर में कुछ महीनों से होने वाली बरकत को अपने व्रतों का  प्रसाद मान कर फूल रही थी। बिना खुद जाने मैं उस अनजान फरिश्ते के बारे में उसे बताना नहीं चाहता था।

दो महीने और बीत गए। रुपये बेनागा आए। मैंने पाँच सात सौ रुपए चोरी-चोरी जोड़े, कि कवि सम्मेलन के बहाने भोपाल जाऊँगा और लौटकर पत्नी को पारिश्रमिक के तौर पर वो रुपये दे दूँगा। 

मैं माल्ती को अपना कार्यक्रम बताता, उससे पहले ही हमारे एक नोनीहाल को किताबें चाहिए थी, दूजे को स्कूल पिकनिक जाने की जिद थी और तीजे के जूते टूट गए थे। जोड़े हुए रुपए बराबर हो गए । 

दो महीने बाद दीवाली आ गई। मेरे अनजाने आर्थिक मददगार की बदौलत काफी सालों बाद हमारी दीवाली बहुत अच्छी रही। माल्ती और बच्चों ने खूब अरमान निकाले।

सब ठीक था। सभी खुश थे। लेकिन मेरा चित्त अशांत था। मैं कम बोलने लगा था। लिख नहीं पाता था। यह स्पष्ट था कि हर माह बिना भूले इतने रुपये भेजने वाला यह भगवान-स्वरूप व्यक्ति मुझ से  ही संबंधित था। उसका वह संदेश और फिर मनीआर्डर का दफ्तर में ही आना दोनों इसी ओर इशारा करते थे।
दिन-ब-दिन मेरा बोझ बढ़ता जा रहा था। बहुत बार मैं कल्पना करता था कि यदि ये सारे रुपये मुझे एक साथ लौटाने पड़े तो? मेरा कलेजा काँप उठता था।
दस महीने हो गए थे। हजार रुपये प्रति माह आ रहे थे। कौन भेज रहा था और क्यों  भेज रहा था, यह अभी भी नहीं पता था। 

एक दिन मैंने दफ्तर से माल्ती को संदेश भेज दिया कि मैं दो दिनों के लिए बाहर जा रहा हूँ। साथ में कुछ रुपये भी भिजवा दिए। विवाह के कुछ वर्षों बाद पत्नी के लिए पैसा, पति से अधिक महत्वपूर्ण होता है शायद। दो-तीन सौ रुपए लौट कर भी थमा दूँगा तो शिकायत की कोई गुंजाइश नहीं रहेगी।' मैंने सोच लिया |

मैं रात की ट्रेन से भोपाल के लिए रवाना हो गया। सीधा सुकृति प्रकाशन  के दफ्तर पहुँचना चाहता था मैं इस बार। 

बुधवार था अगले दिन। छुट्टी नहीं होगी। कोई न कोई तो जरूर मिलेगा।
पूरे रास्ते मैं तरह तरह की कल्पनाएँ करता रहा, अनुमान लगाता रहा और बेचैन रहा।

तड़के ही मैं भोपाल पहुँच गया। कुछ समय स्टेशन पर गुजारा। जब बाहर सड़कों पर चहल-पहल शुरु हो गई तो मैंने बड़े बाजार के लिए टेम्पो पकड़ा। 
सुकृति वालों का दफ्तर खुला नहीं था। मेरे पेट में हौला हो रहा था। मन तो नहीं था, पर मैंने पोहों का नाश्ता कर लिया। 
करीब पौने दस बजे दफ्तर खुला। मैंने कुछ और देर इंतज़ार किया।
सवा दस बजे मैं घबराते हुए अंदर दाखिल हुआ। 

दफ्तर छोटा ही था । बाहर वाले हालॅ में वही व्यक्ति मेज पर बैठा था जिसने दफ्तर खोला था।
"मैं, मृगनयनी जी से मिलना चाहता हूँ," मैंने उस व्यक्ति से कहा।
मेरा प्रयोजन सुनते ही वह खड़ा हो गया। उसके चेहरे पर हवाईयाँ उड़ने लगीं। उसने दुविधा का थूक निगलते हुए मुझे बैठने के लिए कहा। मैं समझ गया था कि वह मृगनयनी और मनीआर्डर के विषय में कुछ जानता जरुर है।

'मृगनयनी नाम की तो यहाँ कोई नहीं हैं,' वह बोला। मैं उसे घूरता रहा। जानता था ऐसा करने से वह असहज हो जाएगा। 'फिर भी, मैं मैडम से पूछ कर बताता हूँ।' यह कहकर वह जल्दी से उठा और अन्दर वाले बंद कमरे की तरफ बढ़ा।

मैं समझ गया था कि अंदर बैठी महिला या तो स्वयं मृगनयनी है या इस काल्पनिक चरित्र की रचयिता।

वह एक मिनट से भी कम समय में बाहर आया और मुझे भीतर जाने को कहा।

कमरे का दरवाजा खोलते ही मैं ठिठक गया। बड़ी सी मेज के उस ओर खड़ी नैनिका मुस्कुरा रही थी। मेरी नसों में खून जम गया था। मैं न आगे बढ़ पा रहा था और न लौटना चाहता था। 


'आओ न, शशांक। यहाँ तक पहुँच गए हो तो आगे भी आ ही जाओ।' उसने कहा।
मैं दो कदम आगे बढ़ कर खड़ा हो गया। कुछ देर उसे निहारा फिर कहा, 'दस महीनों से रुपये तुम भेज रही हो?'
वह चुप रही।

'क्यों? क्या जरूरत थी इस दया की? और वह भी बेनाम। भला क्यों? भगवान बनने का नया शौक चढ़ गया है क्या?'

'बाप रे! इतने सारे प्रश्न। इतना गुस्सा। बैठो तो सही।' वो  बिल्कुल भी बदली नहीं थी।

मैं खड़ा रहा और उसे देखता रहा। मन ही मन सोच रहा था कि कह तो दिया इतना कुछ आक्रोश में। कहीं उसने भी कह दिया कि वापिस कर दो अगर तुम्हें ठीक नहीं लगा तो। मैंने तो कभी सोचा भी नहीं था कि  वो गुप्त मसीहा  नैनिका होगी। याद ही कहाँ थी वो मुझे।

'बैठो न, शशांक। झगड़ा करने आए हो क्या बस?'

मैं अपनी गलती सुधारने के इरादे से धीरे से बैठ गया | 
बाहर बैठा व्यक्ति पानी का गिलास  व चाय मेज़ पर रख गया |

'हाँ, क्या कह रहे थे तुम, एहसान, भगवान् बनने की कोशिश ?' उसने हँसते हुए कहा |

'और क्या है ये सब, नैनिका?'

'मैंने तो हमेशा लिख कर भेजा था कि यह तुम्हारे दिए एक क़र्ज़ कि किश्त मात्र है|'

'मैंने तुम्हें कौनसा क़र्ज़ दे दिया? ज़िन्दगी ने बनाया ही कब मुझे इस लायक, कि मैं किसी को कुछ दे सकूँ?'

'दिया था | और बिना बताये, बिना जताए दिया था | मैंने भी उस ही तरह उस क़र्ज़ को उतरने कि कोशिश कि, बस |'
'मैं झुंझलाने वाला हूँ बस | कृपया करके आप सीधे शब्दों में समझाएंगी, नैनिका जी ?'

'हाँ. बताती हूँ | पर तुम काफी बदल गए हो| पहले काफी शांत रहते थे तुम |'

'ये सब छोड़ो | मुद्दे कि बात करो | मुझ पर अचानक इतनी दया का कारण क्या है? जब करनी चाहिए थी तब तो कि नहीं गयी ?'

 'तुम न तब दया के मोहताज थे, न अब हो | और यकीन मानो, मैं तो इस स्तिथि में बिलकुल नहीं हूँ कि तुम पर कोई दया करूँ | कॉलेज में कितनी कवितायेँ लिख कर मेरे डेस्क में रखीं थीं तुमने, याद है ?' उसने मुझे देखा | वह शांत, संयमित, मुस्कुरा रही थी |

मुझे वाकई याद नहीं था | नैनिका को तो में जवानी कि नादानी समझ कब का भुला चुका था | भुला क्या मिटा चुका था |

'जानती हूँ, तुम्हें याद नहीं होगा | तभी तो मैंने कहा था कि क़र्ज़ देकर भूल तुम गए थे | त्रेसठ कवितायेँ लिखीं थीं तुमने डेढ़ साल में |'

'हाँ तो?' वो क़र्ज़ तुमने स्वीकार कहाँ किया था | अगले दिन टुकड़े टुकड़े करके वापस फेंक देती थी मेरे डेस्क में |'

'अपनी डायरी में नोट करने के बाद फेंकती थी | तुम फिर भी नहीं माने | यह वही क़र्ज़ है |'

'यह क़र्ज़ कैसे हुआ? मैं समझ नहीं पा रहा हूँ |'

'किसी को महत्वपूर्ण होने का एहसास कराना, किसी को  भगवान सा सम्मान देना, किसी को दिन रात सोचते रहना, क़र्ज़ ही तो हैं | कितनी भावनाओं से लिखी होंगी वो कवितायेँ तुमने ? त्रेसठ कविताओं में त्रेसठ हज़ार भावनाएँ घुटी होंगीं | सेकंड ईयर में प्यार हुआ था न तुम्हें? सात सौ दिनों में सात हज़ार बार तुम्हारी नज़रों में खुद के लिए प्रशंसा देखी थी | ख़ुशी तो मिलती ही है न इन सबसे? वही क़र्ज़ है ये |' वह बोलती गयी |

'इतना मोल समझतीं यदि  उस सब का, तो स्वीकारा क्यों नहीं?' मैंने पूछ लिया | बस यूँ ही उत्सुकता हो रही थी |

'तीन बहनें-बहनें हीं थीं हम | भाई नहीं था | माँ-बाऊ जी बोझ समझ कर रोज़ अपनी परेशानी सबसे कहते थे | रोज़ कॉलेज के लिए निकलते समय माँ हिदायत देतीं थीं कि कोई ऐसा काम न करूँ जिसका  छोटी बहनों पर  बुरा असर पड़े |'

'अब अचानक क्या हुआ ?'

'अचानक कुछ नहीं हुआ, शशांक | बस मौका दे दिया ज़िन्दगी ने |

'सुकृति प्रकाशन मेरे पति का था | चार वर्ष पहले उनका देहांत हो गया | हमारे दो बच्चे हैं | उनके व अपने जीवन-यापन के लिए इसे चलाना मेरी विवशता थी | उनके जाने के बाद काम काफी कम हो गया | लोगों को मुझ पर विश्वास नहीं था | सारा काम बस मैं और विपिन जी ही सँभालते हैं | बाकि लोगों का वेतन मैं वहन नहीं कर सकती थी | अच्छा साहित्य प्रकाशन के लिए आ ही नहीं रहा था | तब मुझे तुम्हारी उन कविताओं कि याद आई | पर बिना तुम्हारी अनुमति के कैसे छापती | तुम्हें ढूंढा | तुम्हारी परिस्तिथि पता चली | मैं एक साथ तुम्हें कुछ दे नहीं सकती थी, इसलिए मासिक किश्त के रूप में तुम्हें रुपये भेजने शुरू किये | आश्वस्त थी, कि तुम मुझे पहचान लोगे किन्तु ऐसा नहीं हुआ |'

'नैनिका लिखती तो पहचानता न | मृगनयनी नाम प्रयोग क्यों किया तुमने ?'

'मैंने कहाँ प्रयोग किया | तुमने किया था कई कविताओं में मेरे लिए यह नाम | तुम सब भूल गए हो | अच्छा ही है न | हम दोनों ने ही इसे ज्यादा जटिल नहीं किया |'

'ऐसे ही पूछ रहा हूँ, क्या तुम मुझसे प्यार करतीं थीं ?'

वो हल्का सा हँसी | 'नहीं, कभी नहीं | हाँ, बस सम्मान करती थी तुम्हारी भावनाओं का | मैं स्वार्थी नहीं हो सकती थी | माँ के निर्देशों का पालन करना ही था मुझे | और फिर प्यार का मतलब किसी को पा लेना ही होता है क्या ? कुछ देर के लिए महत्वपूर्ण समझा या पूरी ज़िन्दगी के लिए समझा, ये कहाँ महत्वपूर्ण है? माप और परिमाप तो लोलुपता हैं, शशांक | इनके चक्कर में पड़ गए तो भूख कभी मिटती ही नहीं |' 


मैं उसे देखता रहा और सुनता रहा | सोच रहा था कि ठीक ही तो हुआ | उसकी परिपक्वता बता रही थी कि मैं उसके योग्य ही नहीं था |

'खैर छोड़ो ये सब, बताओ, हमें इज़ाज़त है न, तुम्हारी वो कवितायेँ छापने की?'


मैंने उसकी आँखों में देखा | बहुत चमक थी उन आँखों में | मैं ज्यादा देर देख नहीं पाया |


'मेरी कहाँ हैं वो कवितायेँ | मेरे पास तो उनकी प्रति भी नहीं है | कोई पंक्तियाँ भी याद नहीं हैं मुझे | तुम्हें दे दीं थीं | तुम्हारा ही अधिकार है उन पर | मैं तो बस शर्मिंदा हूँ कि तुम्हारे रूपये नहीं लौटा पाउँगा |' मेरी आँखों में आँसू छलक आये थे |


'बीस हज़ार ठीक हैं न ?' नैनिका बोली |


'नहीं, अब मत भेजना  कुछ भी | बहुत भेज चुकी हो तुम |'


'बीस तो तुम्हें लेने हीं होंगे | कॉन्ट्रैक्ट साइन  कर लेते हैं |' वह उठ कर दरवाज़े तक गयी और विपिन को कॉन्ट्रैक्ट अंदर देने के लिए कहा |


मैं चुपचाप हस्ताक्षर करता रहा लेकिन मेरे भीतर तूफ़ान मचा हुआ था |


कॉन्ट्रैक्ट साइन करने के बाद मैंने कहा, 'तुम्हारा यह एहसान कभी चुका नहीं पाउँगा मैं | रूपये मत भेजना अब , नहीं तो मैं अपनी ही नज़रों में गिर जाऊँगा |'


'ऐसा मत बोलिये, कविवर | आपका अधिकार है वो | हम आपकी कला कि कीमत देने लायक हैं ही नहीं | सच पूछो तो कोई प्रकाशक लेखक कि कला खरीद नहीं सकता | दिल और दिमाग पर कोई बोझ मत लो | बीस किश्तें भेजने के बाद मैं कुछ नहीं भेजने वाली | बिज़नस वोमेन हूँ |' वो फिर हँस पड़ी |


'मैं चलता हूँ |' कहकर, मैं खड़ा हो गया |


'ठीक है | और हाँ, काव्य संग्रह का शीर्षक " मृगनयनी " कैसा रहेगा ?' यही सोचा है मैंने | तुम चाहो, तो बदल सकते हो | अभी समय है |'


'मैं कौन होता हूँ, नैनिका | तुम जैसा चाहो , करो |'


वापसी बड़ी कष्टदायक थी | मेरे कदम घिसट रहे थे | शरीर बहुत भारी लग रहा था | मैं भोपाल कुछ हज़ार रूपये के बोझ के साथ आया था, परंतु कई क्विंटल भावनाओं के बोझ के साथ लौट रहा था | प्यार न उसे मुझसे था अब, न मुझे उससे था, पर फिर भी उसने क्या कर दिया मेरे लिए| मैं कभी उसका बदला चुका भी पाउँगा? इतना बड़ा कवि नहीं था मैं, कि मेरी किताब बीस हज़ार  रूपये में खरीदे कोई | मैं कवि समझता था खुद | कवि, जो भावनाओं कि साँसों पर   जीते हैं | मैं सोचता था कि प्रेम कि व्यख्या मैं ही कर पाता हूँ  अपनी कविताओं में | पर नैनिका ने चुपचाप प्रेम कि सटीक व्याख्या कर दी | सच, खोने- पाने से कहीं ऊपर होता है प्रेम | 



शुक्रवार, 22 जुलाई 2016

शिकायतें




                                                                    शिकायतें 



कविता -
ब्याह के पैंतालीस सालों बाद अब हम दोनों एक साथ अनिश्चित अवधि के लिए घर से निकले थे । थोड़ा सा जीवन खुद को तैयार करने में निकल गया और बाकी का सारा उत्तरदायित्वों का निर्वहन करने में। स्वयं को समझने और टटोलने का  पूरी तरह समय ही नहीं मिला। बहुत बार चुराया थोड़ा थोड़ा लेकिन उसमें ग्लानि इतनी थी कि हर बार प्रयास अधूरा ही रह जाता था। 
इस बार इन्होंने कहा था, 'चलो, जिंदगी जीने चलते हैं।'
  
पिछले वर्ष नौकरी से रिटायर हुई तो रमेश ने भी बिजनेस पूरी  तरह बेटों को सौंप दिया। सत्तर के हो गए थे। मैं तो कई सालों से कह रही थी पर वो कहते थे, 'जब तुम घर पर रहोगी तभी छोड़ूँगा। तुम्हारे बिना अकेला क्या करूँगा।'

घर में सभी कामकाजी हैं। बेटे  रमेश के साथ बिजनेस देखते हैं ।  बड़ी बहू मेरी तरह टीचर है और छोटी बैंक में नौकरी करती है।बेटी अपने घर की हो चुकी है।

मैंने मथुरा में गोवर्धन पर्वत की परिक्रमा करने की इच्छा जाहिर की तो रमेश तुरंत मान गए। मुझे बाद में लगा कि शायद मैंने उनके साथ अन्याय कर दिया। कहाँ चल पाएंगे ये सात कोस नंगे पैर? उन्होंने कहा, 'तुम हो न साथ। चल लेंगे  धीरे धीरे। हमें कौन सा लौटने की जल्दी होगी |'

परिक्रमा के शुरू के दो कोस मैं उनके साथ चली। बहुत धीरे-धीरे चल पा रहे थे वो। 

'तुम चाहो तो कुछ दूर अपनी रफ्तार से चल लो। आगे कहीं बैठ कर मेरा इंतज़ार कर लेना।' उन्हें पता नहीं क्यों लगा  कि मैं सहज नहीं हूँ। 
मैंने मना किया तो उन्होंने कहा, ' तीर्थ में थोड़ा एकांत होना चाहिए। तब ही तो मन ईश्वर से जुड़ पाएगा। ऐसे तो हम एक दूसरे में ही उलझे रहेंगे। तुम चलो, मैं आ रहा हूँ। बस परिक्रमा मार्ग पर ही रहना।'

मैं चल दी। उनकी ज्यादातर बातें मान ही लेती हूँ मैं। अकेले होते ही मन ख्यालों का हो गया।

मेरे ख्यालों की पुड़िया में जैसे राख भरी थी। खोलते ही आँखों में आ पड़ी। सब धुधंला हो गया। मन अतीत की पोथी खोल पढ़ने लगा था।

सोलह साल की थी जब रमेश से मेरा विवाह हुआ था। नौ वर्षों का अंतर था हम दोनों में।
बस फोटो दिखाया था माँ ने। मेरी मर्जी  नहीं  पूछी थी। मैं नासमझ थी। एक दो सहेलियों की शादी हुई थी।उनकी बातें सुनकर मुझे भी शादी का शौक  तो था। रमेश सुन्दर थे। आयु के एक दशक के अंतर के प्रभाव समझने लायक बुद्धि नहीं थी मुझमें। सोलह की उम्र में शादी का शारीरिक पहलू ही समझ आता है। सहेलियों के वर्णन याद करके मेरे  शरीर में गुदगुदी होने लगती थी।
रमेश कुछ ज्यादा ही परिपक्व थे। नौ लोगों के परिवार में वे अकेले थे जो नियमित आय वाले थे । इनके पिताजी की हर दो महीने बाद नौकरी छूट जाती थी। फिर तीन चार महीने घर पर पड़े रहते थे। 
रमेश मेरी कल्पनाओं वाले पति जैसे नहीं थे। प्यार था, ख्याल बहुत ज्यादा था पर चुहलबाजी, शरारत, छेड़खानी, हँसीं-मजाक नहीं था। 
मैं उनके साथ खेलना चाहती थी । वो अपनी उम्र से भी पाँच वर्ष बड़े थे। मैं उनके प्यार की डोर पर पतंग बन उड़ना चाहती थी। उन्हें पतंग उड़ाने का चाव ही नहीं था।  वो मुझे गोद में उठा कर चल रहे थे जबकि मैं उनका हाथ पकड़ कर चलना चाहती थी। मुझे भर रहे थे वो पर मैं  भीगना चाहती थी। वो बहुत कम बोलते थे। मैं उदास रहती थी। मुझे उनमें पति कम व पिता अधिक दीखता था |

ग्यारहवीं का  रिजल्ट आने से पहले ही सगाई हो जाने का मतलब माँ-बाप की लड़की को आगे पढ़ाने की जिम्मेदारी खत्म। 
शादी के दो महीने बाद ही उन्होंने कहा था, 'कविता, मैं चाहता हूँ कि तुम आगे पढ़ो। मैं तो पढ़ नहीं पाया पर हम दोनों में से एक तो पढ़ा- लिखा होना चाहिए।'

मैंने न चाहते हुए भी उनकी इच्छा का सम्मान किया। उन्होंने मुझे बी.ए. कराया फिर बी.एड. और फिर नौकरी। घर में बवाल मच गया था उनके इस फैसले से। परंतु ये टस से मस न हुए। मेरी दो ननदें ब्याह चुकी थीं। तीसरी कालेज में पढ़ रही थी। चौथी के साथ, रमेश ने मुझे भी दाखिला दिला दिया। 

बाहर वाले जब मेरे सास-ससुर को इस बात के लिए सराहते थे तो वे इसका सारा श्रेय अपनी जेबों में भर लेते थे और घर पर आए दिन कामकाज को लेकर कलह करते थे। बिना योगदान के तारीफें लूटने में उन्होंने कभी संकोच नहीं किया और मेरी शिक्षा के रास्ते में रोड़े अटकाने में कोताही भी नहीं बरती। 

कुछ महीनों बाद उन्हें दादा-दादी बनने का भूत सवार हो गया। रमेश ने निर्णय सुना दिया कि बच्चा तो मेरी नौकरी लगने के बाद ही होगा । इस पर उन्होंने खाना-पीना छोड़ दिया। जब रमेश ने धमकी दी, ' यदि आप ऐसा ही करते रहे तो मैं अलग हो जाऊँगा।' तब उनकी कोशिश बंद हुई।

बी.एड. करते ही मेरी सरकारी नौकरी लग गई। मैं वैचारिक रूप से अधिक परिपक्व हो गई थी। शिक्षा और आयु का मिला-जुला प्रभाव था। परंतु रमेश के साथ अब भी वैचारिक सामंजस्य नहीं था। हम और भी कम बात करते थे। 

अड़तीस वर्ष की नौकरी में तीन बार मेरा मन फिसला। मैं दूसरे पुरुषों की ओर आकर्षित हुई। बातचीत हुई। एक दो बार उनके साथ बाहर भी गई पर चरित्रहीन होने से पहले ही संभल गई। बच्चे हुए और पता ही नहीं चला कब बड़े हो गए।  जीवन व्यस्त हो तो  कम जिया जाता है। बस फिर खुद के बारे में सोचने की फुर्सत नहीं मिली। उनकी शादियाँ हुईं। बेटे-बहुओं  और बेटी-दामाद के आपस के सामंजस्य को देख खुशी तो होती थी पर अपना अधूरापन पहले से ज्यादा परेशान करता था। वो जलन नहीं थी, बस टीस थी। असंतुष्टि की टीस। 
जैसे उनका परिवार उनकी जिम्मेदारी था, शायद वैसी ही मैं थी। लदे हुए आदमी पर एक और बोझ, एक अतिरिक्त बोझ। उन्होंने नहीं कहा पर मुझे ऐसा ही लगता था। 

हमारे बीच कभी कोई बड़ा झगड़ा नहीं हुआ। मन-मुटाव नहीं  हुआ। बहस भी शायद ही कभी हुई हो। हम एक दूसरे से कभी बहुत देर तक रूठे नहीं रहे क्योंकि न उन्होंने और न ही मैंने, गलती मानने में देर नहीं लगाई। हम कभी अलग-अलग नहीं सोए। फिर भी एक अधूरापन लगता था।


रमेश-

कविता कुछ गुमसुम है। किसी गहरी सोच में डूबी है शायद। पीछे मुड़कर देख भी नहीं रही है। जैसे भूल ही गई है कि मैं भी साथ हूँ। आवाज़ दूँ उसे? नहीं। कुछ देर उसको उसके साथ ही रहने देता हूँ। मिल तो जाँएगें ही हम।

पता नहीं कितने सालों बाद घर से निकले हैं हम एक साथ। जब उसकी छुट्टियाँ होती थी तो मुझे फुर्सत नहीं होती थी।

इस तरह बेफिक्र होकर तो पहली बार निकले हैं। सारे काम खत्म कर लिए हैं इसलिए घर लौटने की चिंता भी  नहीं है।

उसकी उदासी का कारण जानता हूँ मैं। बहुत कोशिश की मैंने कि उसके साथ हमउम्र बन जाया करूँ पर ऐसा हो नहीं पाया। सात भाई-बहनों में सबसे बड़ा लड़का हँसी ठिठोली और शरारतें भूल ही जाता है। उसे न चाहते हुए भी वक्त से पहले बड़ा हो जाना पड़ता है। मेरी जीवन की सीमितता का खामियाजा भुगता है कविता ने। मैं उसकी अपेक्षाओं पर खरा नहीं उतर पाया लेकिन उसने मुझे कभी निराश नहीं किया।


याद है न इससे पहले जिस लड़की से बात चली थी उन्होंने क्या कहकर मना कर दिया था। 'ये अपने परिवार को खिलाएगा या हमारी बेटी को?' इसलिए तो मैंने कविता को उसके बराबर का बना दिया। शायद उस पढ़ी-लिखी लड़की को  दिखाने के लिए।


बजाय अपनी परिपक्वता की उंगली थमाने के यदि मैं उसके बचपने का हाथ थाम कर चलता तो क्या वो खुद या हमारा परिवार उस स्तर पर पहुंच पाता जहाँ हम आज हैं?

मैंने उसका इस्तेमाल नहीं किया पर शायद उसे ऐसा ही लगता है। साठ पार कर गई है  लेकिन है अभी भी वैसी ही सोलह साल की। जानता हूँ बहुत शिकायतें हैं उसे मुझसे। पता नहीं जीते जी दूर भी कर पाऊँगा या नहीं। हमेशा यह ही सोच कर संतोष करता रहा हूँ कि नाराज बेशक रही हो पर उसने कभी मेरी परेशानियाँ बढ़ाई नहीं। कहाँ जी पाता मैं सत्तर बरस यदि वो झगड़ालु होती।


रिश्तों में एक दूसरे का नजरिया समझना  बहुत जरूरी होता है | यदि आप अपने नज़रिए से सब कुछ मापते रहे, तो ग़लतफ़हमी और शिकायतें तो रहेंगी हीं | चीज़ें हमेशा वैसी नहीं होती जैसी हमें  दिखती हैं | जो दीखता है उसके पीछे जो है वो देखना कहीं जरूरी होता है | ऐसा न करने से परेशानी हमें भी होती  है और दूसरे को भी |  


कविता -

काफी आगे निकल आयी थी | मन थका हो तो शरीर भी जल्दी थक जाता है | मैं एक बैंच पर बैठ गयी | मन का तूफ़ान अभी शांत नहीं हुआ था |


रमेश लगभग आधे घंटे बाद पहुँचे | थकावट उनके चेहरे पर साफ़ दिख रही थी | मैंने उन्हें पानी दिया | दस  मिनट तक वो कुछ नहीं बोले |



'कुछ परेशान हो | कुछ कहना चाहती हो?' उन्होंने चुप्पी तोड़ी |
'विवाह क्या एक दूसरे की जरूरतें पूरा ककरने का अनुबंध मात्र होता है?' मैंने शून्य में ताकते हुए पुछा |

'नहीं, एक दूसरे को संवारने की चुनौती होता है'

मैं उन्हें देख रही थी। कहना चाहती थी, 'फिर तो बहुत बड़ा अहसान कर दिया तुमने मुझ पर' पर कह नहीं पाई।

'मैं ऐसा सोचता हूँ' उन्होंने कहा।

'मैं आपको कैसे संवार सकती थी?'

'अरे! कैसे संवार सकती थीं पूछती हो। संवारा तुमने मुझे।'

'कैसे?' मैंने हँस कर कहा।

'मेरी जिम्मेदारियों के आड़े न आकर। कभी शिकायत न करके।' उन्होंने मेरा ह हाथ में ले लिया, 'सोचो, यदि तुम मुझे उन्हें पूरा करने से रोकती या शिकायत करती या वैसे ही अड़ंगे अड़ाती जैसे मेरे माता-पिता ने तुम्हारी पढ़ाई के लिए अड़ाए थे तो क्या हम इतना सुखमय जीवन जी पाते। नहीं। मैं तनाव में रहता और शायद अब तक निकल चुका होता। तुमने कभी उसकी शिकायत नहीं की इसलिए मैं तुमसे जुड़ा रहा। तुम मुझे रोकती तो शायद, शायद क्या पक्का, मैं उनके और पास चला जाता और तुमसे दूर। जानता हूँ तुम्हारे प्रति उनका व्यवहार कभी ठीक नहीं रहा । फिर भी तुमने मुझे नहीं रोका इसलिए तुम मेरी दृष्टि में महान बनी रहीं। मर्द न कविता, पेड़ जैसा होता है। कई शाखाओं को पालना होता है उसे, बराबर बराबर। वो चाहे भी तो उन शाखोंको काट नहींसकता। पत्नि उस पेड़ से लिपटी बेल जैसी होती है।'

'यदि कोई उन शाखों को काट डाले तो कितने  फल आएंगे उस पेड़ पर और कितनी छाया दे पाएगा वो पेड़?'

'ठीक कह रही हो। कितना सही सोचती हो तुम।'

'मुझे आज सब जो मान देते हैं न, वो मैंने नहीं कमाया, तुमने कमा कर दिया है मुझे। वो तुम्हारा है। ऐसे संवारा है तुमने मुझे। तुमने मुझे वैसा ही रहने दिया जैसा मैं था या हूँ | कभी बदलने की कोशिश नहीं की | करतीं तो भी मैं इस रिश्ते में रहता पर शायद मन मार कर | फिर हमारा ये सम्बन्ध इतना सुखद न होता शायद |'

'मैं जैसे यशोदा और मेरा जीवन मानो कान्हा-ऐसा लगता है मुझे। पास है पर मेरा नहीं है।' मैंने गोवर्धन पर्वत की ओर देखते हुए कहा।

वे बोले, 'देवकी जैसा होता तो कैसा लगता?'

मैंने उनकी ओर देखा। निरुत्तर थी मैं।

'समय तो हमेशा कंस जैसा ही होता है सभी का, कविता। हर कहानी थोड़ी सी पात्र लिखते हैं, थोड़ी कहानी खुद लिखती है और बाकी की सारी वक्त लिखता है।'

मैं उनके चेहरे की झुर्रियों में उलझे संयम को  माप रही थी। वो मेरी आँखों में गोते खाते प्रश्न  ढूंढ रहे थे।

'हमेशा मुझे यही बात अखरती थी कि तुम कभी शिकायत क्यों नहीं करतीं। बहुत ज्यादा करती तो भी शायद खलता मुझे।'
मैं हल्का सा मुस्कुरा दी। शायद व्यंग्यात्मक  लगा उन्हें। पर जल्दी से प्रतिक्रिया देने की आदत नहीं थी उन्हें।

'तुम्हें आगे पढ़ने और नौकरी करने देने के पीछे मेरी मंशा खुद को आर्थिक सुदृढ़ता देने की नहीं थी। मैं बस यह चाहता था कि तुम सारे दिन घर में बंद रहकर बस ताने ही न सुनती रहो। तुम्हारा अपना दायरा हो।' वो बोलते रहे, मैं सुनती रही। पहली बार इतना बोल रहे थे वो।

'देख लो, उम्र की बाउंड्री तो तुम भी पार कर चुकी हो और मैं तो बोनस जी रहा हूँ। कब हमारा साथ छूट जाए प तुम जानती हो न मैं। बस अब अपने लिए जीते हैं। तुम खूब शिकायत करना, मैं सुनुगाँ। पतंग बन उड़ तो पाओगी नहीं तुम और न ही मैं उड़ा पाऊँगा। पर छत पर शाम की चाय तो साथ पी सकते हैं न हम। और फिर वहीं देर तक बैठे रहकर चाँद को चिड़ाएँगे। देखना, सारे के सारे तारे हमारा ही साथ देगें और हवा भी खूब हँसेगी।'

मैंने उनके कंधे पर सिर टिका दिया । वो मेरे गालों पर थपकी देने लगे। उनकी बातों की दवा ने पैंतालीस वर्षों की पीड़ा मिटा दी थी। शायद इनसे मेरी शिकायतें फ़िज़ूल ही थीं | ये तो नहीं कहूँगी की सारी की सारी एक दम से दूर हो गईं थीं, पर हाँ, मन शांत था अब |

मंगलवार, 12 जुलाई 2016

किन्नर

                                                                                   
                                                                                     

                                                                               किन्नर 


उन्नीस साल का था, अधपका, कम स्याना और दबा-दबा, जब पढ़ाई छोड़ कर नौकरी करनी पड़ी। शायद परिस्थितियों ने अल्हड़पन निगल लिया था। चुप-चुप रहता था क्योंकि किसी को बताने के लिए कुछ था ही नहीं। तभी तभी सपनों की तेरहवीं की थी। शक्ल मातम मनाती रहती थी।

अशोक विहार के एक स्कूल में लैब-एटंडेंट के पद पर नौकरी लगी थी, लगी क्या थी पिताजी ने किसी से कहकर लगवाई थी। मल्का गंज से ११५ नम्बर बस पकड़ता था। दो रुपये का टिकट जाते हुए और दो रुपये आते हुए। माँ दस रुपए रोज़ देती थी, 'खर्च चार ही करना । जेब खाली नहीं होनी चाहिए।' मैं यह सोचते हुए घर से निकल जाता था कि जाने कौन सी मुसीबतें होंगी जिनका सामना मैं छह रुपयों के साथ कर लूँगा।

नौकरी को एक हफ्ता हो गया था। एक सुबह मायूसी का बस्ता टाँगे मैं वहीं मल्का गंज के बस स्टॉप पर खड़ा था।दो किन्नर भी वही खड़े थे बस के इंतज़ार में । दो बार पहले भी देखा था उन्हें। बस आई। मैं टिकट लेकर पीछे वाली सीट पर बैठ गया। किन्नर वहाँ पहले ही बैठे थे। मेरे बाद उनमें से एक टिकट लेने कंडक्टर के पास गया, सौ रुपये का नोट लेकर। 
'टूटे दे। छयानवे कहाँ से वापस दूँगा तुझे।' डी.टी.सी. के कंडक्टर किसी और ही मिट्टी के बने होते हैं।
'टूटे न हैं,' किन्नर सहमी आवाज़ में बोला।

'नीचे उतर लो फेर,' कहकर कंडक्टर ने सीटी बजा दी। मुझे पता नहीं क्या हुआ, बिना अपनी जेब का गणित किए खड़ा हुआ और चार रुपये कंडक्टर की ओर बढ़ा दिए, 'टिकट दे दीजिए।' शायद इसलिए क्योंकि बचपन से सुनता आया था कि हीजड़ों की दुआएँ खाली नहीं जाती। दुखों से घिरा आदमी सुखों से ज्यादा दुआओं की तलाश में रहता है। किन्नर मुझे देखता रहा। 

सीट पर वापस आकर किन्नरों ने आशीषों की झड़ी लगा दी। चार रुपये में चार सौ दुआएँ खरीद ली थीं मैंने।

अगले दिन किन्नर बस स्टॉप पर मिले । मेरे पहुँचते ही पचास का नोट मेरी तरफ बढ़ाया, 'ले भैया, रख ले।' मैंने नोट नहीं पकड़ा।

'खुले नहीं हैं मेरे पास। चार ही दे दीजिए बस।'

'वापस नहीं माँग रही, भैया। सारे रख ले।'

उसने मेरा हाथ पकड़ कर उठाया, नोट थमाने के लिए । मैंने मुठ्ठी बाँध ली।

'आपकी दुआएँ कहाँ से लौटाऊँगा मैं? देने हैं तो बस चार ही दीजिए।' मैंने कहा। दोनों किन्नरों ने बारी बारी मेरी बलाएँ ले लीं।

'बस में देती हूँ या फिर कल।' कहकर उन्होंने फिर मुझे ढेरों आशीर्वाद दे डाले।

दिन बीतने लगे। किन्नर अक्सर मिलते थे। रोज़ बलाएं लेते थे। कई बार लाख मना करने पर भी मेरा टिकट ले लेते थे। दस बारह दिन में कोफ्त होने लगी थी मुझे। शायद उनके व्यवहार से कम और घूरते फुसफुसाते लोगों से ज्यादा परेशानी थी मुझे। जब मेरे पास टाईम होता तो दूर खड़े होकर उनके चले जाने का इंतजार करता। फिर दूसरी बस पकड़ता था।
तनख्वाह का दिन आ गया। माँ ने हिसाब समझा दिया था । अठारह सौ नवासी रुपये  तनख्वाह मिलेगी। अठारह सौ पचास रुपये  निकालना । पंद्रह सौ घर में देना और साढ़े तीन सौ खुद रख लेना। अगले महीने किराया नहीं दूँगी मैं। और हाँ, पहली कमाई है। आते समय आजादपुर से लड्डु-गोपाल के वस्त्र और भोग के लिए कुछ लेते आना।'

बैंक का एक्सटेंशन काउंटर स्कूल में ही था। कैशियर ने सारे  पचास के नोट दे दिये थे। नोटों की इतनी मोटी तह सहेज कर जेब फूला नहीं समा रही थी। 

छुट्टी हुई तो आजादपुर जाने के लिए मैंने 235 रूट नंबर की बस पकड़ी। प्रेमबाड़ी पुल पार करते ही बस में साथ खड़े लड़के ने जेब पर हाथ मारा। मुझे पता चल गया और मैं अलग हट कर खड़ा हो गया। शालीमार बाग पार हुआ तो उसने फिर कोशिश की। मैं चौकन्ना था। मैंने उसकी कलाई पकड़ ली।

'क्या बात है?' मैंने उसे घूरते हुए पूछा और जेब में हाथ डालकर नोटों को ढक लिया।

'क्या?' उसने पलटकर कहा, बड़ी लापरवाही से।

'जेब पर हाथ क्यों मार रहा है बार-बार। जेबकतरा है?'

उसने मेरे कंधे को धक्का दिया, 'जेबकतरा किसको बोला । हैं, जेबकतरा किसको बोला?'

'तुझे ही बोला है। जेब पे हाथ मार रहा है बार -बार,' मैंने आसपास खड़े लोगों की तरफ देखते हुए कहा । कोई कुछ नहीं बोला। बस आजादपुर पहुँच ही गई थी।

'चल नीचे आ जा। अभी तेरी गर्मी निकालता हूँ।' जेबकतरा जानता था कि मुझे वहीं उतरना है। शायद टिकट लेते समय सुन लिया था उसने। मैं जान चुका था कि  वो अकेला नहीं है क्योंकि मुझे पीछे से भी कोई धक्का दे रहा था। मुझे सिर्फ अपनी पहली कमाई की चिंता थी। पिटना तो मेरा तय था। 

आजादपुर बस स्टाप पर उतरते ही मेरे चारों तरफ घेरा बन गया। मैंने तो दो की ही उम्मीद की थी पर वो पाँच लोग थे। बस के स्टॉप से रवाना होते ही मुझे बस से उतारने वाले जेबकतरे ने मुझे थप्पड़ जड़ दिया।

'हीरो बन रहा था न। कर क्या करेगा, जेबकतरा ही हूँ मैं।' मेरा एक हाथ अब भी मेरी जेब में ही था। दूसरे हाथ से मैंने उसकी ठोड़ी पकड़ ली। लोग तमाशा देखने के लिए इकट्ठे होने लगे थे। मेरी पीठ पर कुछ घूंसे पड़े। एक ने  जेब वाला हाथ भी बाहर खींचा। मैं मदद के लिए चिल्ला रहा था और वो मुझे गालियाँ दे रहे थे। शायद जानते थे कि भीड़ सिर्फ तमाशबीन लोगों की है।

अचानक भीड़ में से आवाज़ आई, 'भैया तू।' आवाज़ जानी पहचानी थी। मैंने मुड़ कर देखा। तीन किन्नर भीड़ को चीरते हुए आगे बढ़ रहे थे।

'क्या हुआ?' किन्नर बोला, 'जेबकतरे हैं न ये?'

मैंने गर्दन हिलाई।

'तू जा भाई। इन्हें हम देख लेंगे।' दूसरा किन्नर बोला ।

पता नहीं कौन सी बस स्टैंड पर खड़ी थी। मैं चढ़ गया। चलती बस से देखा तो जेबकतरों की पिटाई शुरू हो गई थी।

'एक मर्द की रक्षा आज हीजड़ों ने की ' मैं सोच रहा था,'इनका लिंग बनाने में भगवान से गलती जरूर हो गई पर इनका दिल सोने का बनाया है उसने।'

लड्डू -गोपाल के वस्त्र और भोग तो मैंने किंगस्वे कैंप से खरीद लिए पर सच में भोग लगाने का मन तो उन किन्नरों को था जिन्होंने मेरी पहली तनख्वाह और मुझे पिटने से बचाया था।



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