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सोमवार, 19 जून 2023

सनातनी आदर्शों की परिभाषा हैं राम



सनातनी आदर्शों की परिभाषा हैं राम 



 श्री राम के अस्तित्व और जन्म को लेकर अनेक शोध कार्य हुए। कुछ ने राम-युग लाखों वर्ष पूर्व बताया तो कुछ ने ईसा से 300 वर्ष पूर्व। 


मैं विज्ञान का विद्यार्थी रहा हूँ इसलिए कार्बनडेटिंग को ही सबसे विश्वसनीय मानूंगा। इसके अनुसार राम ईसा से 5121 वर्ष पूर्व हुए। यानी अब से लगभग सात हजार वर्ष पूर्व।

गर्व का विषय है कि लगभग सात हजार वर्ष पूर्व भी हिंदू और हिंदू-सभ्यता नैतिक मूल्यों, संस्कारों, संबंधों की मर्यादा और सामाजिक नियम एवम् दायित्वों के प्रति इतनी सजग थी।

मैं सूर्यद्विज सनातनी ब्राह्मण हूँ। राम मेरे हृदय में बसते हैं। श्री राम का अस्तित्व मेरे लिए उतना ही सत्य है जितना मेरा स्वयं का अस्तित्व। जो लोग किंतु- परंतु में फंसे हैं, आदि-संत वाल्मीकि द्वारा रचे चरित्रों को सत्य चाहे ना माने, उनके द्वारा रचित ग्रंथ को तो सत्य मानते होंगे। 

साहित्य किसी समय के समाज और संस्कृति का सबसे मौलिक साक्षात्कार होता है। साहित्यकार वही लिखता है जो उसने देखा, समझा, या जिया होता है।
मैं वर्ष में कम से कम एक बार श्रद्धेय संत तुलसीदास जी की रामचरित मानस का पाठ करता हूं और नियमित रूप से सुंदरकांड पढ़ता हूं। जितनी बार पढ़ता हूं, चकित भी होता हूं और गर्वित भी।
कितने उच्च पारिवारिक और सामाजिक मूल्य थे। गुरुओं के प्रति क्या आदर-भाव था कि एक पिता पुत्र को स्वयं से दूर नहीं भेजना चाहता था किंतु गुरु की आज्ञा की अवहेलना नही कर सकता था। एक भाई अपने नव वैवाहिक जीवन की आहुति दे देता है और दूसरा , माँ द्वारा षडयंत्रों में पकाकर ही सही, किन्तु परोस कर दिया गया राज्य ठुकरा दिया। एक कोमलांगी, नवविवाहित पत्नी जो आभूषण, वैभव, ऐश्वर्य को अपने पतिव्रत पर न्यौछावर कर पति के साथ वन को चल देती है। महावीर हनुमान जैसा भक्त जिसने हृदय में राम को बसा लिया था। महर्षि वाल्मीकि ने खलनायक का चरित्र भी ऐसा रचा जिसके आदर्श कलयुग के सबसे सज्जन पुरुष से भी ऊँचे होंगे।

मुझे गर्व होता है सनातनी सभ्यता पर जिसके ग्रंथों में सात हज़ार वर्ष पूर्व बंदर, भालू और गरुड़ भी आदर्शवादी थे। मित्रता पूज्य थी। अग्नि की शपथ विश्वसनीयता सुनिश्चित करती थी। अग्रज पिता तुल्य होता था और उसकी पत्नी माता तुल्य। तब भी सनातनी नदी, पहाड़, आकाश, अग्नि, वायु, सागर और भूमि को पूजते थे। 

निष्पक्ष होकर सोचें, धर्मों की व्यर्थ प्रतिद्वंदिता को परे करके सोचें, मनुष्य होकर सोचें, तो क्या रामायण के आदर्श अनुसरणीय नहीं हैं। राम को जानने के बाद किस धर्म की माता अपने पुत्र को राम जैसा बनाने की इच्छा नहीं पाल लेगी? 


#राम #सनातन #धर्म #अयोध्या #राममंदिर #ram #ayodhtakeram 


सोमवार, 28 अगस्त 2017

रामलीला








                                रामलीला 






कल ऐसे ही अपने विधार्थियों से पूछ बैठा कि उनमें से किस-किस ने रामलीला देखी है। उनके उत्तर सुन कर बड़ा आश्चर्य हुआ। कुछ ही ने रामलीला देखी थी वह भी एक या दो दिन । हाँ, टीवी पर रामायण बहुत लोगों ने देखी थी।
दुख हुआ कि एक परम्परा और सास्कृतिक धरोहर मिटने के कगार पर है। इस बात का भी क्षोभ हुआ कि हमारी नई पीढ़ियाँ कितनी शानदार चीजों से वंचित कर दी गई है।



                              




फिर मन में प्रश्न उठे कि क्या रामलीला की  प्रासंगिकता रामचंद्र जी के जीवन मूल्यों को नई पीढ़ी तक पहुँचाने मात्र ही है? यदि हाँ, तो टीवी पर ही देख लेने में क्या बुराई है?

मैं रामलीला को किसी विशेष धर्म के प्रचार व प्रसार के प्रयास के रूप में नहीं देखता।  ऐसे आयोजनों से समाज में उत्साह और उल्लास रहता है। लोग आनंद में रहते हैं तो खर्च करते हैं। सभी का भला होता है।
सोच के देखिए पूरे पैंतीस दिन रौनक- सड़क पर भी और मन में भी। चहल-पहल,  सजे हुए पंडाल, लाउड स्पीकर पर ठुमक चलत रामचंद्र, बाजत पैंजनिया 
बजता रहता है, दशरथ का विलाप, जटायु का करहाना,  रावण की गरजना और अट्टहास गूँजता है मनोरंजन की पराकाष्ठा होती है। फिर यह चिंतन उल्टी चाल चलते हुए मुझे मेरे बचपन में घसीट ले गया।



हमारे मोहल्ले में प्रति वर्ष रामलीला का मंचन होता था। कनागत खत्म होते ही मंदिर में रामलीला की रिहर्सल शुरू हो जाती थी। मुख्य पात्र निश्चित रहते थे और बहुत से लोग एक से अधिक भूमिकाएँ करते थे।
अक्टूबर में हल्की ठंड पड़ने लगती थी। बिना बाजू का स्वेटर माँ जबरदस्ती पहना देती थी। मुझे पहले भेजा जाता था कुर्सियाँ घेरने के लिए। आठ बजे लगभग मंच का पर्दा उठता था। 


उल्लास और उत्साह का माहौल रहता था। पंडाल के बाहर खोमचों की कतारें शाम से ही लग जाया करती थीं। मूंगफली, चाट-पकौड़ी, आइसक्रीम, गुब्बारे, धनुष-बाण, गदा, रामायण के पत्रों के मुखौटे, नकली मूँछे, और हाँ, सरकंडों वाला साँप, याद है न, जो बड़ा और छोटा हो जाता है , सब मिलता था / रामलीला देखते रहिये, मुँह चलाते रहिये / शायद पूरे दिन में वो इतना ना कमा पाते हों जितना शाम से रात तक कमा लेते थे। उन लोगों पर रामचंद्र जी की कृपा उन दस दिनों में खूब होती थी।



                           





नुक्कड़ के दर्जी की दुकान पर काम करने वाला पतला-दुबला लड़का आसिफ सीता का रोल करता था। गजराज भैया  दूध बेचते थे । शरीर और चेहरा भारी-भरकम था। दो महीने पहले से ही मूँछे बढ़ानी शुरू कर देते थे। ढेढ़ इंच चौढ़ी और नथुनों के दोनों ओर चार-चार इंच लम्बी, घनी और किनारों पर दो-तीन बार घूमती हुई काली स्याह मूँछ देखकर छोटे बच्चे तो डर ही जाया करते थे। उनका दमदार ठहाका और कंपा देने वाली आवाज उन्हें साक्षात लंकापति रावण का स्वरूप देती थी। बाकी सब कुछ तो किराए पर आता था लेकिन रावण की पूरी वेशभूषा वे अपनी पर्सनल खरीद कर लाए थे किनारी बाजार से। 
पीछे वाली गली में रहने वाले देवदत्त भाई दशरथ, परशुराम और सुग्रीव , तीनों पात्र बखूबी निभाते थे। उनके दशरथ विलाप के अभिनय पर ईनामों की झड़ी लग जाती थी। ग्यारह, इक्कीस, इक्यावन और कभी कभी तो एक सौ एक भी। गज्जू भाईसाहब पर भी खूब रुपए बरसते थे। राम-सीता विवाह में लोग दिल खोल के कन्यादान देते थे। कलाकारों की यही आय हुआ करती थी।





                                           




रामायण में मेरा सबसे प्रिय पात्र लक्ष्मण  है। काफी सालों तक यह इच्छा भी रही कि एक बार यह पात्र रामलीला में करूँ पर कभी किसी पर जाहिर करने का साहस नहीं हुआ। मोहल्ले की रामलीला का  लक्ष्मण परशुराम संवाद मैं कभी नहीं छोड़ता था। कल्पना करता रहता था कि मैं यदि लक्ष्मण की भूमिका मैं होता तो कैसे करता। 

जहाँ साधारण लोगों को खुशी मिलती थी, गरीब लोगों को अतिरिक्त आय के अवसर मिल जाते थे। इससे न सिर्फ हिन्दू बल्कि मुस्लिम समुदाय के लोग भी होते थे। बच्चों को हमारे देश की परंपरा से साक्षात्कार होता था। कलाकारों को अपनी प्रतिभा दिखाने के लिए मंच मिलता था और जीवन की एकसारता में सकारात्मक परिवर्तन आता था। वर्ष का एक तिहाई भाग उमंग और उल्लास के वातावरण में कटे तो इससे अच्छा क्या हो सकता है।


रामलीला अब भी होती है लेकिन हर मोहल्ले में नहीं। आज के व्यस्त जीवन में दूर जाकर दो-तीन घंटे रामलीला देखना असम्भव है और हम लोगों की अरुचि के कारण के कारण यह हर मोहल्ले में नहीं हो पाती/ लोग इच्छुक तो होते हैं परन्तु उनके पास न धन होता है, न कलाकार और न ही दर्शक/

रामलीला श्रवणकुमार की मातृ-पितृ भक्ति से आरम्भ होती है और भारत मिलाप पर समाप्त होती है / दोनों ही बड़े प्रेरणादायक प्रसंग हैं / है न ? टीवी पर रामायण का सार दूसरे कार्यक्रमों में कहीं खो जाता है/ मंचित रामलीला की अनुभूति कुछ अलग ही होती है/ 








#रामलीला #मंचन #हिंदी #लेख #परम्परा #संस्कृति #रामचन्द्रजी # राम-सीता #अयोध्या

शनिवार, 15 जुलाई 2017

नाम गुम जायेगा....गुलज़ार





नाम गुम जायेगा....गुलज़ार 








"....रोज़गार के सौदों में जब भाव-ताव करता हूँ गानों की कीमत मांगता हूँ -सब नज्में आँख चुराती हैं और करवट लेकर शेर मेरे मूंह ढांप लिया करते हैं  सबवो शर्मिंदा होते हैं मुझसे मैं उनसे लजाता हूँ बिकनेवाली चीज़ नहीं पर सोना भी तुलता है तोले-माशों में और हीरे भी 'कैरट' से तोले जाते हैं .मैं तो उन लम्हों की कीमत मांग रहा था जो मैं अपनी उम्र उधेड़ के,साँसें तोड़ के देता हूँ नज्में क्यों नाराज़ होती हैं ?" 

गुलज़ार साहिब की शख्सियत और कविताओं के बारे में लिखना धुप को मुठ्ठी  में पकड़ने जैसा है | बारिश  की बूँदें पक्के  फर्श पर गिरें तो संगीत बजता है, मिटटी पर गिरें तो खुशबू आती है और रेत पर गिरें तो छेद करती हुई धंस जाती हैं | कविता आँखें पढ़ें या कान सुनें, जाकर धँसतीं दिल में है |

                                     कांच के ख्वाब हैं, आँखों में चुभ जायेंगे....

गुलज़ार साहिब की कविता के शब्द रोज़-मर्रा की भाषा के आम शब्द होते हैं | ऐसे शब्द जो कविता का हिस्सा भी बन सकते हैं, कभी शायद ही किसी ने सोचा हो पर सुनो तो लगता है जैसे शायद कविता के लिए ही बना था ये | सुनने में इतना अच्छा तो पहले कभी लगा ही नहीं ये |
हिंदी एक संभ्रांत भाषा है पर हिंदी के गूढ़ शब्दों की बजाय आम बोलचाल के शब्दों का ऐसा अनूठा ताना-बाना बुनते हैं गुलज़ार साहिब कि पढ़ने और सुनने वालों पर जादू हो जाता है | गुलजार साहिब की कविताओं का अपना मिज़ाज़ होता है | जितनी बार पढ़ी जाए, अर्थ गहरा होता जाता है |


"मौत तू एक कविता है
मुझसे एक कविता का वादा है मिलेगी मुझको

डूबती नब्ज़ों में जब दर्द को नींद आने लगे
ज़र्द सा चेहरा लिये जब चांद उफक तक पहुँचे
दिन अभी पानी में हो, रात किनारे के करीब
ना अंधेरा ना उजाला हो, ना अभी रात ना दिन "



कल्पना शब्द का विस्तार कितना होगा? गुलज़ार साहिब के गीतों और कविताओं को पढ़ने के बाद समझ आ जाता है कि इस प्रश्न का कोई औचित्य नहीं है | कल्पना के विस्तार कि सीमा निर्धारित कर पाना असंभव है | " जहाँ न पहुंचे रवि, वहां पहुंचे कवि " का तात्पर्य आँखों के आगे तैरहै |

वो गीत लिखते हैं और 'प्यार' क्या है समझा देते हैं | कौन इन शब्दों को चुनौती  दे सकता है...

" हमने देखी है उन आँखों कि महकती खुशबू
हाथ से चुके इसे रिश्तों का इलज़ाम न दो
सिर्फ एहसास है ये रूह से महसूस करो
प्यार को प्यार ही रहने दो कोई नाम न दो |

प्यार कोई बोल नहीं, प्यार आवाज़ नहीं
एक ख़ामोशी है, सुनती है, कहा करती है
न ये बुझती है, न रुकती है, न ठहरी है कहीं
नूर की बूँद है सदियों से बहा करती है

मुस्कुराहट सी खिली रहती है आँखों में कहीं
और पलकों पे उजाले से झुके रहते हैं
होंठ कुछ कहते नहीं, काँपते होंठों पे मगर
कितने ख़ामोश से अफ़साने रुके रहते हैं | "

इंटरनेट पर इस गीत के बोल जहाँ भी पढ़ें होंगे, उसके नीचे कमेंट पढ़िए | लोगों ने लिखा है, " दिस सॉन्ग है चेंज्ड माय लाइफ " | और कितने गीतों के लिए ऐसी प्रतिक्रिया पढ़ी है आपने ?

गुलज़ार साहब को लफ्जों को बुनने में कमाल की महारत हासिल है। आत्मा दिखती नहीं पर जिन्दगी की आत्मा दिखती है समपूरण सिहँ कालरा जी के शब्दों में।

ऐ जिंदगी, गले लगा ले...

या फिर

तुझसे नाराज नहीं जिंदगी,हैरान हूँ मैं ....


श्रोता, सहर्ष इन लफ्जों से जुड़ जाता है क्योंकि जिंदगी बसती है इन गीतों में।इन कविताओं के शब्द किसी आम आदमी की अलमारी में अलग से रखे आने-जाने के कपड़े पहन कर नहीं निकलते या किसी अमीर की तरह स्पेशल दिन के लिए किसी मंहगे शोरूम से खरीदे कपड़ों में सजे नहीं होते। ये तो मन के  ड्राइंग रूम में जैसे बैठे होते हैं वैसे ही चल देते हैं और खूब रंग जमाते हैं।

गुलज़ार साहब की कविता गैरपारंपरिक है। उपमाएँ अनूठी हैं। ख्वाब कहीं काँच के हैं तो कहीं सात रंग के। कभी रास्ते शिकायत करने लगते हैं तो कभी गले लगा लेते हैं। पहाड़ सबक देते हैं कभी तो कभी नदियाँ। मानवीकरण का इससे अद्भुत उपयोग कभी किसी ने नहीं किया।


किताबे झांकती है बंद अलमारी के शीशों से
बड़ी हसरत से तकती है 
महीनों अब मुलाकाते नही होती
जो शामें इनकी सोहबत में कटा करती थी अब अक्सर
गुजर जाती है कंप्युटर के परदों पर
बड़ी बेचैन रहती है किताबे ....
इन्हे अब नींद में चलने की आदत हो गई है
बड़ी हसरत से तकती है ..

जो कदरें वो सुनाती थी
की जिन के सैल कभी मरते थे
वो कदरें अब नज़र आती नही घर में
जो रिश्ते वो सुनाती थी
वह सारे उधडे उधडे हैं
कोई सफहा पलटता हूँ तो एक सिसकी निकलती है
कई लफ्जों के माने गिर पड़े हैं
बिना पत्तों के सूखे टुंडे लगते हैं वो सब अल्फाज़
जिन पर अब कोई माने नही उगते
बहुत सी इसतलाहें हैं
जो मिटटी के सिकूरों की तरह बिखरी पड़ी है
गिलासों ने उन्हें मतरुक कर डाला 

जुबान पर जायका आता था जो सफहे पलटने का
अब उंगली क्लिक करने से बस इक झपकी गुजरती है
बहुत कुछ तह बा तह खुलता चला जाता है परदे पर
किताबों से जो जाती राब्ता था ,कट गया है
कभी सीने पर रख कर लेट जाते थे
कभी गोदी में लेते थे
कभी घुटनों को अपने रिहल की सूरत बना कर
नीम सजदे में पढ़ा करते थे ,छुते थे जबीं से
वो सारा इल्म तो मिलता रहेगा बाद में भी
मगर वो जो किताबों में मिला करते थे सूखे फूल
और महके हुए रुक्के
किताबें मँगाने ,गिरने उठाने के बहाने रिश्ते बनते थे
उनका क्या होगा
वो शायद अब नही होंगे !!







गुलज़ार साहब की हर एक नज्म एक नायाब तोहफा है शब्दों की मालाओं का शौक रखने वालों के लिए बेशकीमती कलेक्शन हैं ये नज़्में l

नज़्म उलझी हुई है सीने में  
नज़्म उलझी हुई है सीने में 
मिसरे अटके हुए हैं होठों पर 

उड़ते-फिरते हैं तितलियों की तरह 

लफ़्ज़ काग़ज़ पे बैठते ही नहीं 

कब से बैठा हुआ हूँ मैं जानम 

सादे काग़ज़ पे लिखके नाम तेरा

बस तेरा नाम ही मुकम्मल है 

इससे बेहतर भी नज़्म क्या होगी

गुलज़ार साहब कहते हैं...



"मेरे लिए यह चुनाव कर पाना बेहद मुश्किल है कि मेरी अब तक की सबसे पसंदीदा कविता कौन सी है क्योंकि ऐसा करने पर बाक़ी सारी कविताएं बेकार हो जाती हैं."



"अलग-अलग मौक़ों पर अलग-अलग नज़्मों की अहमियत होती है. मेरे ख़्याल से किसी भी शायर के लिए यह मुमक़िन नहीं कि वह कोई एक ऐसी कविता बता सके, जो उसे सबसे ज़्यादा प्रिय हो. हां, यह ज़रूर पूछा जा सकता है कि आज मुझे कौन सी कविता अच्छी लग रही है या यह पूछा जा सकता है कि कल कौन सी कविता मुझे पसंद थी."


कुछ गीत ऐसे होते हैं जो तभी सार्थक लगते हैं जब आप कहानी जानते हों या उन पर हो रहे अभिनय को देख रहे हों । कुछ गीत ऐसे भी होते हैं जिन्हें आप जब सुनें तब वो तस्वीर देखें जिनमें अभिनेता भी आप हों और कहानी भी आपकी हो। ऐसे गीत और उन्हें रचने वाला गीतकार अमर हो जाता है। 


तुम पुकार लो तुम्हारा इंतजार है


हुजूर इस कदर भी न इतरा के चलिए


मेरा कुछ सामान तुम्हारे पास पड़ा है

कतरा-कतरा मिलती है


गुरुवार, 8 जून 2017

मंडी


किसान सरकार से दुखी नहीं है| न मौसम से | न अपनी किस्मत से और न भगवान् से |

दरअसल, हमारे देश में लोग काम करने से ज्यादा आसानी से पैसा कैसे कमाया जाये इस फन में माहिर हैं | दूसरे की मेहनत पर ऐश कैसे की जाए, ये एक कला है | लोग सरकारी नौकरी इसलिए पाना चाहते हैं क्योंकि   वहाँ काम काम, पैसा ज्यादा होता है| ऊपर की आमदनी का भी पूरा स्कोप होता है |




                                                                                      मंडी 


तड़के तीन बजे -गाँव वालों के लिए नया दिन शुरू हो जाता है। शहर वाले अभी थोड़ी देर पहले ही सोए होते हैं।
मंडी के मेन फाटक को पार करते ही एक चाय वाला इतना मुस्कुरा  रहा है मानो ऊपरवाले ने उसके होंठ वैसे ही बनाएँ हों। रोता होगा तो भी वैसा ही दिखता होगा वो। गल्ले के बराबर में धुप-बत्ती का पूरा सोटा सुलगा दिया है | बीच बीच में भजन गुनगुना ले रहा है |पठ्ठे की बोहनी  की केतली तीस चाय की चढ़ी है।


एक लड़का दौड़ कर आया , "आज बैंगन बीस, टमाटर पच्चीस, पालक दस, गोभी-मूली पाँच रुपये धड़ी," बोला और पलट गया। 
चबूतरे पर बीड़ी पीते पच्चीस -तीस आड़तियों ने न उसकी ओर देखा न उसके जाने के बाद कोई प्रतिक्रिया दी। ऐसा लगा जैसे कोई भक्त जल्दी में पत्थर की मूर्ति के सामने कुछ बड़बड़ा कर चला गया हो। हाँ, चाय वाले ने सुना और शायद गाँठ में बाँध भी लिया।

उसके लड़के केतलियाँ के साथ आज का भाव भी अंदर छोड़ आए थे। आड़तियों ने चाय खत्म करके फिर बीड़ियाँ सुलगा लीं थीं।


पौ फटी। मंडी में रौनक बढ़ने लगी थी। बाहर ट्रेक्टर, ट्रक, छोटे हाथी, घोड़े और बैल गाड़ियों में लदलद कर ताजी सबि्जयाँ और किसानों की उम्मीदें भी पहुँचने लगी थी। 


 किसानों की चहचहाहट और उत्तरप्रदेश की कामचलाऊ गरीब स्ट्रीट लाइट्स में चमचमाती उनकी आँखों की रौशनी बता रही थी आज उम्मीद कुछ ख़ास है जैसे सास को बहू के पहले जापे के वक़्त होती है |

ऊंघते आढ़ती भी अब चुस्त हो गए थे |

किसान आते, आढ़तियों से मिलते | बातचीत होती | किसान मुँह बिचकाते, गर्दन हिलाते और घिसटती उम्मीद के साथ अंदर बढ़ जाते कि शायद भीतर किसी और दुनिया के लोग हों और मन मुताबिक भाव मिल जाए |
दिन चढ़ने लगा | गाड़ियां लदी खड़ी हैं | चाय-वाले, गुटखा-बीड़ी वाले, दस-रूपये प्लेट छोले-भठूरे वाले एक-एक बार अपना गल्ला खाली करके नोट अंटी  कर चुके हैं | किसान बेचारे मुरझाये चेहरों, आँखों में बुझा अलाव लिए उस ही चबूतरे पर गुमसुम बैठे हैं जिस पर उनके यहाँ आने से पहले ही उनका आज का ज्योतिषफल रच दिया गया था |

आखिर दो बजे, किसानों को आढ़तियों के तय किये भाव पर ही सौदा देना पड़ा | 

थोक में वो माल दोगुने में गया | मसलन बैगन पचास का धड़ी | और गली मोहल्ले में सब्ज़ी वालों ने कॉलोनियों की औक़ात के हिसाब से भाव तय किये | यानी, सबने अपने भाव पर वो सौदा बेचा जो उसने पैदा नहीं किया था | सिवाय उसके जिसने मिटटी से गुहार लगाई, सूरज से लोहा लिया, बादलों  के आगे गिड़गिड़ाया,और अपने  बच्चों   को भूखा सुलाया , वो ही बस, उसे अपनी मेहनत की कीमत पर नहीं बेच पाया |

चायवाला, पान-बीड़ी-गुटखे वाला, आढ़ती, सब उम्मीद से ज्यादा ले गए पर किसान, उम्मीद के आस-पास भी फटक नहीं पाया |



#किसान #मंडी #आढ़ती #मंदसौर #सरकार #क़र्ज़ #आत्महत्या #कर्जमाफी #मध्यप्रदेश 




शुक्रवार, 9 दिसंबर 2016

कवि



सभी कवियों को समर्पित....

                                     कवि 




उनके लिए चाँद वो नहीं जो विज्ञान की किताबों में लिखा होता है। न सूरज आग का गोला होता है। रात काली शाल ओढ़े कोई रूपसी दीखती है उन्हें और सितारे छत की मुडेर पर बैठा मोर चुग ले, ऐसी  मीठी गोलियों जैसे लगते हैं।
वो रास्तों से बातें करते चलते हैं। पता नहीं मंजिलों की चिंता होती भी है उन्हें या नहीं। शायद इसलिए कभी भटकते नहीं वो।
सच, बड़े अनबूझे से होते हैं कवि।

 क्रांति को ईंधन चाहिए हो, मौसम के यौवन के मद का व्याख्यान हो, बसंत का आगमन हो या शिशिर की विदाई | रगों में आक्रोश की चाह हो, या उसी आक्रोश को शांत करने की ललक- कवितायेँ सब कुछ करने में सक्षम हैं | सोचिये, क्या कवियों से बड़ा इंजीनियर हो सकता है कोई? 

कवि की कलम मनो जादूगर की छड़ी हो- कागज़ पर घूमी और कमाल हो गया | बर्फ के टुकड़े शोले बन गए, आसमान का कोना  लटक गया, हवा गुनगुनाने लगी, जो कभी किसीसे नहीं बोलते, वो पता नहीं क्या क्या कह जाते हैं | जाने कौन सी स्याही भरते हैं कलम में | स्याही तो एक ही रंग की होती है पर कागज़ पर कड़ाई कई रंगों की उभरती है | एहसास ऐसे पिघलते हैं जैसे गर्म तवे पर मक्खन | 

कोई बहुत सजग होकर रेत पर पैरों के निशान बनाता चले और कोई दूसरा उन निशानों को सहेज कर उठा उनकी तह बनाता रहे - ऐसी होती है कविता।

कवियों को शायद धुंध दिखती नहीं या उन्हें धुंध से कोई फर्क नहीं पड़ता। हमेशा ख्यालों की धुंध में खोए जो रहते हैं।
मन में तहखाना तो सबके होता है पर कवियों के मन में कुछ ज्यादा गहरा होता है। वक्त के साथ साथ यह तहखाना और गहरा होता रहता है। उसमें खिड़कियाँ भी बनती चली जाती हैं। इंजीनियरिंग की न जाने कौन सी तकनीक है साहब। खिड़कियों से हवा अन्दर आती है और खुशबू बाहर आती है। सूखे पत्तों से संगीत निकलता है और भावनाएँ नाच उठती हैं।









कवि पैरों से नहीं चलते शायद। मन के परों से उड़ते हैं। रोशनी से वायदा ले लेते हैं, रात से दोस्ती कर लेते हैं, मुस्कानों को सुनते हैं और हथेली भी गीली न कर पाँए उतने आँसुओं को सैलाब बता देते हैं।

आम लोगों के लिए ख्वाब बड़े वी.आई.पी. होते हैं -प्रतिष्ठित और गणमान्य। पर कवि जैसे उन्हें लंगोटिया यार समझते हैं जब चाहे आवाज लगा ददी। कभी बेचारे लूंगी में बैठे होते हैं तो कभी हजामत बना रहे होते हैं । उन्हें चैन नहीं लेने देते।


पर शब्दों से सृष्टि रच सकने में सक्षम ये कवि खुद बड़े अभिशप्त से होते हैं | कुंठाओं से ग्रस्त | मन में दर्द का अम्बार लिए हुए, आंसुओं का एक शांत  सागर पाले हुए | शायद सब पर लागू न होता हो किन्तु अधिकांशतः ऐसा ही होता है | खुद को अभिव्यक्त नहीं कर पाते हों शायद | ज़िन्दगी कल्पनाओं जैसी नहीं होती | न ही कविता होती है | ज़िन्दगी घिनोना, नंगा, वीभत्स सच होती है | इसे सपनों की तरह जिया जाये तो दुःख ही होगा | इस सब के बावजूद, कवि आशावादी भी होते हैं | एक बूँद आशा मिल जाये बस, खीर बनाने को तैयार रहते हैं कवि | यूँ ही दुनिया पागल नहीं कहती कवियों को | 
अपने टुकड़ों को सहेज कर रखना खूब आता है इन्हें | ज़िन्दगी उधेड़ने से बाज नहीं आती पर ये कविताओं से झटपट सिल लड़ते हैं उस उधड़े को | कवितायेँ ही इनका मरहम है और कवितायेँ ही इन्हें बींधती भी हैं |

हंसी महंगी होती है और हँसाना एक महंगा शौक | दूसरे के मन को मांज कर दुबारा चमका देना- इसी तपस्या का नाम है कविता और उन तपस्वियों को ही कहते हैं कवि |




कवियों को समर्पित इस लेख का अंत अपनी एक कविता से करना चाहता हूँ | आशा है आप सब को पसंद आएगी |



                                                                                 मेरी आँखें 

मैं अपनी आँखों को सामने रखकर

बतियाता हूँ घंटों
बातों ही बातों में कोशिश करता हूँ
भांप लूँ इनके मन को।

क्यों नहीं देखती ये
जो सब देखती हैं।
गिलहरी की अठखेलियाँ जैसे काफी न हों
ये उसके दांत गिनना चाहती हैं।
उडती चिड़ियों का पीछा नहीं करती
उनके पंजों ने जो फूल छापा था
वो ढूँढती हैं।

ये ख्वाबों के लिए तरसती नहीं
जाने कितने छोड़ गए हैं बाप दादा जैसे
दिन में कई जोड़े बदल लेती हैं 
सन्दूक के सन्दूक भरे पड़े हों जैसे।

अभी तक चश्मा नहीं माँगा है इन्होंने,
तेज़ रौशनी में चुंधियाती नहीं हैं,
हर दर्द तजुर्बे सा पाल लिया हो जैसे,

अंधेरों  में भी घबराती नहीं हैं |

बुधवार, 17 अगस्त 2016

बहना ने भाई की कलाई पर प्यार बांधा है ..



                                                     

                         बहना ने भाई की कलाई पर प्यार बांधा है ..


                                                                   
                                               सच्ची भावनाओं का त्यौहार- रक्षाबंधन 



कल रक्षाबंधन है। भाई -बहन के पावन रिश्ते का पर्व। न रोशनी का, ना रंगों का, न असत्य - सत्य का, बस भावनाओं का पर्व।

एक कोमल सा धागा जब भाई की कलाई पर सज जाता है तो वह कोमल नहीं रहता। बहनें धागे में गूँथकर अपार स्नेह व भावनाएँ बाँधती है। कुछ दिन बाद, भाई जब उस धागे को उतारता है तो तोड़ता नहीं, बड़ा जतन लगा के खोलता है और उसे संभाल कर रखता है।


व्यक्तिगत रूप से मुझे यह त्यौहार बहुत भाता है। शायद इसलिए कि मैं एक भावुक व्यक्ति हूँ । छोटी-छोटी बात पर मेरी आँखें भीग जातीं हैं। यह लिखते समय भी आँसु आँखों के मुहाने पर छटपटा रहे हैं। अभी कुछ देर पहले ही अपने विधार्थियों से रक्षाबंधन पर बात करते-करते मेरा गला रुंध गया था। मेरा मानना है कि निष्ठुर से निष्ठुर व्यक्ति इस दिन अपनी बहनों के प्रति संवेदनशील हो जाता होगा। इसलिए अपने भावनात्मक रविए पर मुझे शर्मिंदगी नहीं होती।


आज सुबह से ही ऐसा हो रहा है। जैसे ही थोड़ा सा खाली होता हूँ, मन बचपन के अहाते में भाग जाता है।



रक्षाबंधन पर स्कूल की छुट्टी तो होती ही थी। मम्मी पता नहीं कब की उठी होतीं थी। झाड़ू- पोंछा हो चुका होता था जब वो हमें उठाने के लिए झिंझोड़ती थी। भगवान के आले के दोनों ओर व सारे दरवाजों पर खड़िया से चकोर पुता होता था। मैं उठते ही गीली खड़िया पर उंगली लगाता था तो मम्मी हल्की-सी चपत लगा कर कहती थी, " मरे, पूजा होगी। झूठे हाथ लगाता है।"


नहाने के बाद सोहन पुजते थे। हमारे यहाँ यह मर्द ही पूजते हैं। कटोरी में गेरू घुला होता था व माचिस की तिली पर रुई लिपटी  होती थी। पापा सफेद चकोर पर "श्री कृष्ण शरणम् मम:" लिखते थे। गुंधे आटे की बत्तियों से कलावे का हार लगाते थे और रोली के छींटे मार कर जवें का भोग लगाते थे। मैं पूजा की थाली पकड़े ध्यान से सब देखता था।
उस समय मम्मी रसोई में कड़ी चावल बना रही होती थीं। लम्बे श्रावण मास के बाद कड़ी की अटक खुलती है रक्षाबंधन वाले दिन। 


फिर मेरी तीन बहनें मुझे राखी बाँधती थथीं, मीठा खिलाती थीं और आरती उतारती थीं। फिर मैं पापा के दिए हुए पैसे उन्हें देता था।
मैं शैतान था पर उस दिन बड़ा ही संवेदनशील और भावुक हो जाया करता था। अपनी बहनों के प्रति सदा से ही बहुत अधिक प्रोटेक्टिव रहा हूँ मैं, शायद हर रिश्ते के प्रति ऐसा ही हूँ। एक मुझसे बड़ी बहन भी है मेरी लेकिन उसे भी छोटा समझ छाँव देने की कोशिश करता रहता हूँ आज भी। या यह कह सकते हैं कि अकड़ दिखाता रहता हूँ। 


इस त्यौहार की सबसे अच्छी बात है घर में लगने वाला जमावड़ा। बुआओं का आना फिर मम्मी का मामाओं के घर जाना। मूल्य बताकर नहीं सिखाए जाते। निभाकर सिखाए जाते हैं। 


आज बहुत से युवा बच्चों से बात हुई। मैंने पूछा कि उन्हें रक्षाबंधन के बारे में सबसे अच्छा क्या लगता है तो अधिकतर बच्चों का उत्तर था 'घर में सबका आना'। सुनकर मेरी आँखें नम हो गईं। विश्वास थोड़ा प्रबल हुआ कि आधुनिकता भावनाओं को निगल नहीं  सकती।


कुछ युवतियों ने कहा कि वे उपहार मिलने को लेकर उत्साहित हैं। तब मैंने उन्हें एक सच्ची कहानी सुनाई। आपको भी सुनाता हूँ।


बहुत साल पहले की बात है। एक भाई की माली हालत ठीक नहीं थी। बहन राखी बाँधने आई तो इक्कीस रुपये ही दे पाया वह। बहन का मुँह बन गया। बोली, " भाई, मिठाई का डिब्बा, राखी, गोला, और आने जाने का मिला कर दो सौ रुपए के करीब खर्च हुए हैं मेरे। उतने तो देता। इससे अच्छा तो मैं डाक से भेज देती तेरी राखी।"
भाई बहुत शर्मिंदा हुआ। उसके बाद न बहन कभी राखी बाँधने आई और न ही भाई ने उसे बुलाया। बहन अमीर ममेरे भाई को राखी बाँधने जाने लगी। भाई त्यौहार वाले दिन रोता रहता।


कहानी सुनकर लड़कियों ने भी उस बहन को धिक्कारा। रिश्तों का आधार कभी भी पैसा नहीं हो सकता।

सोन आज भी पूजे जाते हैं। बस बाज़ार में रेडीमेड मिलने लगे हैं। मिठाई की जगह चाकलेट प्रचलन में है । आज भी लड़कियाँ क्लास के लड़कों को राखी बाँधती हहैं। आज भी महिलाएँ कई दिन पहले ही राखी की तैयारियों में जुट जाती हैं। हम कितने भी आधुनिक हो जाएं, मन में हम जानते हैं कि सच्ची खुशी कहाँ, कब और कैसे मिलती है।


बच्चों से बात करते समय उनकी आँखों में चमक देखकर बहुत सुकुन मिला। यह बदलते परिवेश, बदलते आचरण, बदलती विचारधारा, बदलता खानपान हम पर कितना भी प्रभाव डाल लें, हमारे पर्व हमें एकदम से अपनी जड़ों में वापस ले जाते हैं, एक दिन के लिए ही सही।


तो, आप सब भी पूरे उल्लास 

और भावनाओं से ओतप्रोत होकर इस पर्व को मनाइए और अपने भाई या बहन के लिए अपने स्नेह को नए आयाम पर ले जाइए।


आप सभी को रक्षाबंधन के अनूठे पर्व की शुभकामनाएं।

शुक्रवार, 5 अगस्त 2016

हमरी भी हैं चारठो सीट- हमहू बनेगें परधानमंत्री






                 हमरी भी हैं चारठो सीट- हमहू  बनेगें परधानमंत्री



संविधान लिखने वाले तो संविधान लिख गए और किसी को भी राजनीतिक दल बनाने का अधिकार देकर चले गए। परिणामस्वरूप आए दिन कहीं न कहीं कोई  न कोई एक नया दल बनाकर देश की राजधानी को अपना घर बनाने का सपना संजो लेता है।
ऐसा ही चलता रहा तो सोचिए कुछ वर्षों बाद ईवीम कितनी बड़ी  होगी। चार लोग कंधों पर उठाकर लाँएगें ले जाँएगें। बटन दबाने के लिए उम्मीदवार को वैसे ही ढूंढना  पड़ेगा जैसे कोई परीक्षा में पास होने की कम उम्मीद रखने वाला विद्यार्थी परीक्षा परिणाम को खंगालता है।

चुनाव चिन्ह कुत्ता, बिल्ली,चमगादड़, नाक, कान, लोटा, सोटा और न जाने  क्या क्या होगें। भई कहाँ से आँएगें इत्ते सारे चिन्ह? मजबूरी न हो जाएगी। कुछ भी मिल जाए बस वाइए चिपका लेंवेंगें। कुत्ता चिन्ह होने से हम थोड़ी ही न कुत्ते हो जाएगें।फिर कुत्ता भी  तो वफादारी का पर्याय है। देश के प्रति हमारी वफादारी का प्रतीक होगा यह चिन्ह। याहिए धर लो।

राज्य में थोड़ा सा दबदबा बना नहीं फिर सीधा केंद्र को साधेगें। भईया राज्य की बागडोर पत्नी, बेटे, बेटी को सौंप हम देश की राजनीति में टांग अड़ाऐगें।
लोकसभा में चार सांसद आए नहीं हमारे कि चिपक लेंगे गठबंधन की सरकार में। अड़ंगा डालने का सर्टिफ़िकेट ऐसे ही तो मिलेगा। प्रधानमंत्री बनने का सपना पालते रहेंगे सही मौका आते ही लपक लेंगे।
अरे बहुत से ग्वाले,मास्टर, और बहनजियाँ ऐसा सपना पाले बैठे हैं। कई तो कब्र में पैर लटकाए भी एक दफा उस कुर्सी पर टिकने की हसरत रखते हैं।हमनने ही कूण से कुकर्म कर राखे हैं। चूँ न देखें सुपना?

केंद्र में कोई बहुमत पा भी जावे तो क्या हुआ? राज्य में तो हमरी भैंसिया  ही चरेगी। देखे नहीं कश्मीर में क्या हुआ।
अब भईया संविधान के इस अधिनियम में कोई संशोधन तो हम होने देगें नही नहीं।

प्रधानमंत्री बनने का इससे सस्ता, सुन्दर और टिकाऊ उपाय यही है भाई रे। हम सकूल में पढ़ने वाले छात्र थोड़ी ही हैं कि परिच्छा में तैंतीस प्रतिशत अंक न आए तो फेल हो जाएंगे। हमरी तो पाँच सौ तैतालीस में से चार ठो सीट भी आ जाएं तो हमरा सपना टूटेगा नहीं। और प्रधानमंत्री न भी  बन पाए तो कुछ तो झटक ही  लेंगे। गृहमंत्री, वित्त मंत्री या फिर कोई राज्य  मंत्री।