गुरुवार, 22 अगस्त 2019

आई.सी.यू.



आई.सी.यू.






आई.सी.यू. के पलंग पर पड़ा
वो निसहाय निरीह आदमी 
जिंदगी और मौत को झगड़ते 
देखता है खामोश डरा हुआ 
जैसे कोई बच्चा कोने में 
दुबका देखता है 
अपने माँ-बाप को झगड़ते हुए 
नहीं जानता वो किसके हिस्से में जाएगा l

बाहर रिश्तेदारों की भीड़ है 
पता नहीं वो थैले में 
आशा और हौंसला लाए हैं 
या आखिरी बार मिल लेने की औपचारिकता 
सबके पास बातें हैं, किस्से हैं, 
पर उसके लिए शायद इतना काफी है 
कि वो आए हैं 
किसी के लिए वक़्त खर्च देना 
भी तो बड़ी बात है 


साँसों का मोहताज वो आदमी 
महसूस करता है 
अपनी कमर के नीचे तड़पती 
अपनी जिम्मेदारियाँ,
बच्चों का भविष्य और
पत्नी का सिन्दूर 
वो चाहता है कमर उचका कर 
उन सब को अलग हटा दे 
पर वो चुभन जिन्दा होने का अहसास है l

अभी कुछ देर पहले ही 
सब मिल गए हैं उससे
माथे की सिलवटों को 
बड़ी शिद्दत से छुपाकर
दो दिन बाद बेटी की फीस भरनी है 
एक हफ्ते बाद बेटे का जन्मदिन है 
और महीने बाद करवा-चौथ है शायद 
उसने देखा था 
सबकी ख्वाहिशें पिघलकर 
आँखों में जमा होने लगीं थीं l

कल तक भाग भाग कर 
उसने सारे कर्तव्यों की किश्त भरी थी 
रात को खाना बड़े प्यार से परोसा था पत्नी ने 
उसने बड़े चाव से खाया था 
पर आधी रात अचानक जिंदगी कसमसाने लगी 
बेचैनी, घबराहट, पसीना- 
सासें उखड़ने लगी 
कुछ देर बाद वो पतंग जैसा था 
जिसकी डोर कफ़न-सा सफ़ेद कोट पहने 
डॉक्टरों के हाथ में थी 
जो शायद भावनाएँ
अपने बैंक के लाकर में रख आये थे 
रोज़ न जाने कितने आते थे उस जैसे 
खर्च करते भी तो किस-किस पर करते l

वो चाहता था उठ कर भाग जाना 
कर्तव्यों की अगली किश्त जुटाना 
पर उसका शरीर उसके वश में ना था
पर अपंग भावनाएँ थीं 
जो आसमान समेट लाना चाहतीं थीं 
सारे कर्तव्य एक साथ पूरे कर देना चाहतीं थीं 
वो जिम्मेदारियों को कमर के नीचे से निकालकर
अपने पेट पर रख लेता है 
और मौत से मोहलत माँगने लगता है l

शनिवार, 20 जुलाई 2019

परवर्ट... यानि छिछोरा




परवर्ट... यानि छिछोरा 



सेंट स्टीफेन कॉलेज के सामने की सड़क  रोज की तरह  उस दिन भी सुनसान थी l नार्थ कैंपस का सबसे वीरान इलाका था ये जबकि देश के सबसे विलक्षण युवा पढ़ते होंगे यहाँ l
कॉलेज के गेट से पचास मीटर दूर बस स्टॉप पर सुजॉय  अकेला खड़ा था l पिछले आधे घंटे में कॉलेज के मैन गेट से कई महँगी गाड़ियाँ और मोटर -साइकिल धड़धड़ाती हुई निकल गईं थीं l पर बस स्टॉप पर कोई नहीं आया l 

वहाँ खड़े-खड़े काफी वक़्त निकल गया था l डीटीसी की बसें हमेशा से ही बड़ी मूड़ी रही हैं l 
तभी कॉलेज के गेट से रौनक बहार आई l "शायद मेरे  लम्बे इंतज़ार का इनाम है ये ," सुजॉय ने सोचा  l खादी ग्रामोद्योग  वाला कुर्ता और काली जीन्स l बुद्धिजीवियों वाला पहनावा l  साथ में लोटो के स्पोर्ट्स शूज l मझली लम्बाई वाले खुले बाल जो दिल्ली की गर्मी से बेहाल निस्तेज कांधो पर पड़े थे l वो जब तक सुजॉय तक पहुंची, वो  उसका सम्पूर्ण आकलन कर चुका था l मन ही मन चाह रहा था कि वो भी वहीँ आकर खडी  हो जाए और फिर वो  दोनों बस का इंतज़ार करें l 

वो सीधा सुजॉय तक आ गई l वो  खुश तो था पर सकपका गया था l 

उसने अपना कुर्ता एक तरफ से ऊपर किया और जेब में हाथ डालकर सिगरेट  की डब्बी निकाली l फिर सुजॉय की  आँखों में देखकर बोली, "डू यू हैव ए लाइट ?" 

सुजॉय  भावशून्य सा उसे देखता रहा l पता नहीं अचम्भा था या मलाल l पहली बार किसी लड़की ने सिगरेट जलाने के लिए उससे  माचिस माँगी थी l और उसके  पास थी नहीं l 

अपना आग्रह दोहराने के लिए उसके होंठ हिले ही थे कि सुजॉय ने  'सॉरी' बोल दिया l वो हल्का सा मुस्काई मानो लानत भेज रही हो और आगे बढ़ गई l सुजॉय का मन हुआ उसका पीछा करे  पर उसने  ठीक नहीं समझा l वो बस उसे दूर जाते हुए देखता रहा l उसे रास्ते में जो भी मिला उसने उनसे माचिस माँगी लेकिन उसकी सिगरेट की उम्र शायद बाकी थी l 

दिन भर सिगरेट-सुंदरी सुजॉय के  ख्यालों में आती-जाती रही l अगले दिन वो  उस ही समय पर सेंट स्टेफेन के बस स्टैंड पर पहुँच गया था और माचिस भी खरीद कर जेब में रख ली थी l 

लगभग उस ही समय पर वही लड़की कॉलेज के गेट से बहार आई l नीली ज़मीन पर सफ़ेद फूलों वाली फ्रॉक बमुश्किल घुटनों तक पहुँच रही थी l पर उसमे वो पिछले दिन से ज्यादा छरहरी लग रही थी l

बाल वैसे ही थे जैसे किसी बच्चे को डाँट-डपट कर बिठा दिया हो l वो सुजॉय के  पास पहुँचती उससे पहले ही उसने  माचिस निकाल कर इशारे से उसे दिखा दी l वो मुस्कुराई, "आई  डोंट  हैवे ए सिगरेट टुडे l " कहकर आगे बढ़ गई l 

निराशा कुछ क्षणों में ही सुजॉय के  उत्साह को लील गई l उसने  खुद को कोसा , "माचिस के साथ दो सिगरेट भी खरीद लेता तो क्या चला जाता l "

अगले दिन क्लासिक रेगुलर की डब्बी और म्यूजिकल लाइटर के साथ सुजॉय  मोर्चे पर तैनात था l उत्साह और उमंग दोनों उफन रहे थे l 
वो कुछ मिनट जल्दी निकल आई थी l सुजॉय  उसे देखते ही आगे आ गया और मुस्कुराने लगा l एक हाथ में सिगरेट की डब्बी और एक हाथ में लाइटर l 

वो कुछ पंद्रह कदम दूर थी जब सुजॉय से  रहा नहीं गया , " आज मैं दोनों लाया हूँ l "
वो गंभीर थी l "इवन आई हैव बोथ ... बट , इट सीम्स, यू आर ए परवर्ट l फ़क ऑफ और आई  विल कॉल पुलिस l "
सुजॉय आगे बढ़ गया l परवर्ट... यानि छिछोरा l सही तो कहाँ उसने l 
सुजॉय कई दिनों तक किसी लड़की  को आँख उठाकर देख नहीं पाया l 

रविवार, 26 मई 2019

रोशन की शादी


कला के प्रति समर्पित एक अव्वल दर्जे के कलाकार दोस्त के जीवन का एक सच्चा प्रसंग ....

                     रोशन की शादी 





दो दिन में दूसरी बड़ी ख़ुशी l ऐसा पहले भी कभी हुआ था,  रोशन को याद नहीं आ रहा  था l परसों ही उसे नाटक में लीड रोल मिला था और आज खबर मिली कि सुलेमान मिर्ज़ा साहब मुख्य अतिथि होंगे l

सुलेमान साहब को गुरु मानता था रोशन l वही तो थे जिन्होने नेशनल स्कूल ऑफ़ ड्रामा में उससे  पहली बार अभिनय  करवाया था  वरना लोग तो  उसे बस गायक मानते थे l फिर कभी उनसे मिलना नहीं हुआl 
रोशन ठान चुका था कि नाटक के बाद सुलेमान साहब से मिलेगा और इस बार उनका फोन नंबर लेना नहीं भूलेगा l

नाटक के दौरान सुलेमान साहब दो -तीन बार उसकी ओर देख कर मुस्कुराये थे l नाटक खत्म हुआ तो रोशन ने फुर्ती से कपड़े बदले और बाहर भागा l सुलेमान साहब जा चुके थे l रोशन को घोर निराशा हुई l संघर्षशील शिष्य को गुरु का आशीर्वाद बूटी जैसा लगता है l रोशन को अपने गुरु के आशीर्वाद की जरूरत थी l 
अगले दिन उसे एक फ़ोन आया l नंबर अनजान था l उसने अनमना-सा 'हेलो ' बोला तो जवाब आया,  "मंज गए हो मियाँ तुमl"
"जी? " रोशन समझ नहीं पाया था l
"मिर्ज़ा बोल रहा हूँ,  बरखुरदार "
रोशन सन्न रह गया l मुँह से आवाज नहीं निकल रही थी l गूंगों की तरह टूटा -फूटा कुछ बोला l
"क्या बड़बड़ा रहे हो?  कल जरूरी काम था सो एक दम निकालना पड़ा l तुम्हारा नंबर ढुँढवाया हैं l क्या कर रहे हो आजकल? " सुलेमान साहब बोले l
"जी.. जी नौकरी l"
"बम्बई आ सकते हो?  29 को एक नाटक कर रहे हैँ l"
बिना कुछ सोचे रोशन ने बोल दिया,  "आ जाऊँगा,  सर l"
"परसों पहुँच जाओ l मैं कल पहुँच रहा हूँ l" गुरु ने फरमान सुना दिया l
"जी" कहकर रोशन सोच मे पड़ गया,  " मुझे भी तो कल ही निकालना पड़ेगा l साहब की तरह हवाईजहाज़ से थोड़े ही जा सकता हूँ मैं l"
"बाकी बातें मुंबई में होंगींl" सुलेमान साहब ने फ़ोन काट दिया l
दो दिन में बम्बई पहुँचना ही इकलौती समस्या नहीं थी l 31 को रोशन की शादी थी यानि शो से दूसरे दिन l कार्ड छप चुके थे l लव अर्रेंज मैरिज थी l ऐसी शादियों में लड़की वाले आखिरी क्षण तक आश्वस्त नहीं होते हैँ खासकर तब जब लड़का खस्ता हाल हो l दिशा के बाऊ जी कहीं ये ना सोच लें कि लड़का शादी से पहले ही भाग गया l
घर जाकर रोशन ने पिता जी को सब बता दिया l उन्होंने तीन चार मिनट सोचा और पूछा,  "शादी पर तो आ जाओगे ना? "
"जी,  पक्का आ जाऊँगा l"
"जाओ,  यहाँ मैं संभाल लूँगा l बस आ जाना l"
जेब में साढ़े सात सौ रूपये पड़े थे l रोशन बिना रिजर्वेशन ही गाड़ी में सवार हो गया l सुलेमान साहब के ऑफिस पहुँचा और अपनी शादी का कार्ड सामने रख दिया l
"किसकी शादी है? " 
"जी मेरी "
"कितने बरस के हो? "
"छब्बीस "
"छब्बीस में शादी कर लेता है कोई? "
रोशन कुछ ना बोला l
"लड़की कौन है? "
"शंभु जी की बेटी "
सुलेमान साहब ने आधी नाक पर रखा चश्मा उतारा,  "क्या..कौन से नंबर की? "
"जी तीसरे "
"मियाँ,  दुनिया वाकई बहुत छोटी है यार l कितने बरस साथ काम किया है हमने और शंभु जी ने l फ़ोन मिलाओ उन्हें l" 
सुलेमान साहब ने शंभु जी से आधा घंटा बात की l पिछले सारे सालों की कसर निकाल रहे हों जैसे l शंभु जी को बता भी दिया कि उनकी बेटी का दूल्हा 29 तक तो बम्बई में ही रहेगा l अंत में आश्वासन भी दे दिया कि दूल्हे को 31 तक लखनऊ पहुँचाना उनकी जिम्मेदारी l
"पागल हो तुम l बताते तो शादी है तुम्हारी l अगले शो में आ जाते l ये कोई आखिरी नाटक है हमारा? "
"मौका नहीं छोड़ना चाहता था ,  सर "
"चलो फिर,  जुट जाओ l तूफानी शो होना चाहिए l"

शो हिट रहा l रोशन 31 की सुबह लखनऊ  पहुँच गया l अम्मा ने घर सिर पर उठा रखा था l शंभु जी के पेट में हौला था l दो घंटे में हल्दी भी चढ़ी,  मेहंदी भी लगी और कंगना भी बंधा l सुलेमान साहब बारात में घोड़ी के साथ-साथ चल रहे थे l शिष्य के लिए तो  हर गुरु भगवान होता है पर गुरु के लिए भी कुछ शिष्य खास होते हैँ l



नोट : गोपनीयता बनाये रखने के लिए नाम बदले गए हैं 



गुरुवार, 16 अगस्त 2018

एक महान नेता का निधन





            एक महान नेता का निधन



बीती शाम एक महान राजनेता का निधन हो गया. राजकीय शोक और सरकारी छुट्टी घोषित हो गई.
टीवी चैनल उनकी महानता बांचकर टीआरपी का घमासान लड़ रहे थे.
लोगों ने देर तक टीवी देखा. अगले दिन छुट्टी जो थी. लोग टीवी आजकल कानों से देखते हैं, आखें तो व्हाट्सप्प और फेसबुक में उलझी होती हैं.
हम लेखक तो आधे अधूरे ही बने हैं अभी पर insomnia पूरी तरह हो चुका है. चाय की लत है. लूले लंगड़े विचार पालते रहते हैं, दार्शनिक जैसा जो दिखना होता है. छुट्टी थी पर हम साढ़े पाँच बजे ही बिस्तर छोड़ रसोई में घुस गए चाय बनाने को. सुबह की पहली चाय बालकनी पर खड़े होकर पीने का मज़ा ही कुछ और है. किसी को कहते सुना था की लोगों को observe करने से लिखने के लिए मसाला मिल जाता है .
सड़क शुक्रवार जैसी न थी. इत्मीनान हाथों में लेकर रीझ रही थी जैसे किसी भूखे को कोई अमीर सौ का नोट पकड़ा गया हो. शायद लोग सो रहे थे. छः बजे बगल के पंसारी वाले गुप्ता जी की दुकान का शटर घड़घड़ा के खुल गया.
दस मिनट बाद वहाँ मिस्टर जोसफ सिगरेट पीने आये और दुबे जी दूध लेने. चर्चा होने लगी. कान लगाकर लोगों की बातें सुनना भी तो लेखकों को भाता है.
"अरे, वो तो पहले ही मर गए थे, बस डिक्लेअर नहीं किया था. पंद्रह अगस्त थी न" दुबे जी बोले. जैसे सरकार सारी जानकारियाँ उनसे साझा करती हो.
"चलो, आज छुट्टी तो मिली." मिस्टर जोसफ ने सिगरेट का लम्बा काश भरते हुए कहा.
सामने से एक परिवार तैयार होकर बस स्टॉप की और जा रहा था.
"हाँ, देखो, लोग तो घूमने निकल पड़े," दुबे जी ने टिपण्णी की. मर्दों में भी छीटाकशीं के गुण होते ही हैं .
"छुट्टी हुई है की ज्यादा से ज्यादे लोग जाकर पुण्य-आत्मा को श्रद्धांजलि दें. लोग छुट्टी मना रहे है," गुप्ता जी चर्चा में कूद आये.
"या फिर टीवी पर देखें और उनके अच्छे काम याद करें," जोसफ ने राय दी जो बिलकुल उनकी सिगरेट के आखिरी कश की तरह औपचारिक थी. ने अंदर कुछ गया, न बाहर कुछ आया.
"उससे तो टीवी वालों की टीआरपी बढ़ेगी, किसी और को क्या मिलेगा? छुट्टी होनी ही नहीं चाहिए. महान नेताओं की मृत्यु पर काली पट्टी बांधकर काम किया जाना चाहिए. बल्कि एक घंटा एक्स्ट्रा काम करना चाहिए ."
दुबे जी कह ही रहे थे की सामने बालकनी से मिसेस दुबे चिल्लाईं, "बेसन भी ले आइयेगा. नाश्ते में पकौड़े बना लेंगें,"
दुबे जी सकपका गए. मुड़े और गुप्ता जी से बोले, "देना, गुप्ता जी, एक किलो बेसन,"

सोमवार, 9 जुलाई 2018

जीवन का अर्थ



                           

                                                                     जीवन का अर्थ 





अपना-अपना जीवन 
हम सब को 
सीधी पंक्तियों सा लगता है..

सीधी पंक्तियाँ
    सभी के लिए अर्थरहित,
और एक चाह,
    कि कोई तो हो, 
जो देख सके 
इनमें एक रचना
पूर्णतः अर्थपूर्ण ...

यही तलाश ही तो है
जीवन का सत्व 
रिक्तता ही तो है 
जीवन का अर्थ 
क्षणों के साथ आतीं
मरतीं सासें
मोमबत्ती सा जलता
घुलता शरीर,
और एक मन...
हर पल कुछ तलाशता,
बेचैन, उत्सुक, हैरान...
ले चलता है जीवन को,
वक्रता की और,
और जब पूर्ण होता है व्रत 
बीच में से रिक्त
तब मर जाता है जीवन...

कुछ नहीं है जीवन
बस शुन्य मात्र 
और जो समझ लेता है यथार्थ 
वो कहलाता है पागल....

बुधवार, 20 जून 2018




                               मैं अब प्रेम की कवितायेँ नहीं लिखता




मैं अब प्रेम की कवितायेँ नहीं लिखता 
नहीं, भावनाएँ नहीं मरीं हैँ मेरी 
बस उनका मोल समझ गया हूँ 
नहीं चाहता कि स्याही में सानकर 
कागज में परोस कर 
उन्हें सब के सामने रख दूँ.




मैं अब प्रेम की कवितायेँ नहीं लिखता,
नहीं, चाँद-सितारों की उपमाएँ 
बेमानी नहीं लगती मुझे,
पर आपकी प्रेयसी 
अतुलनीय भी तो हो सकती है,
क्यों मैं उसकी तुलना करूँ.



मैं अब प्रेम की कवितायेँ नहीं लिखता,
नहीं, ज्यादा पढ़-लिख नहीं गया हूँ,
पर थोड़ी परिपक्वता कमा ली है,
सोचता हूँ, मेरा प्रेम बस मेरा है,
ख़ुशी-उदासी, उमंग-मायूसी,
जो भी पाऊँ, क्यों बाँटु?



मैं अब प्रेम की कवितायेँ नहीं लिखता,
नहीं, मैं कोई असफल प्रेमी नहीं हूँ,
प्रेम की मेरी परिभाषा कुछ अलग है,
शब्दों की चाशनी में लपेटकर,
कहकर, लिखकर या जताकर,
अपनी भावनाओं का बाजार क्यों लगाऊँ ?



रक्त और विधि के गढ़े रिश्तों के बीच,
प्रेम, मन का बनाया 
एक सुन्दर रिश्ता होता है,
अच्छा हो, बुरा हो,
अपेक्षाओं पर खरा उतरे, न उतरे,
उसे मनोरंजन का सामान क्यों बनाऊँ ?

इसलिए, मैं अब प्रेम की कवितायेँ नहीं लिखता....

मंगलवार, 8 मई 2018

बात उन दिनों की है


                         


                            बात उन दिनों की है 



वो दँसवी के बोर्ड वाला साल था। हमारे चेहरे पर पहला मुँहासा उग चुका था। सो, स्कूल यूनीफार्म की नीली पेंट फैशन वाली हुआ करती थी- आगे दो चुन्नटें, घुटनों पर ढीली और तंग मोरी ।
 ग्वालियर की हवा अजीब ही है. एक तरफ से भिंड के डाकुओं की दहशत और दूसरी तरफ मुरैना की गज़क की मिठास. हम  बहुत जल्दी ढलते थे हर माहौल में. 

" मैंने प्यार किया " उस ही साल रिलीज़ हुई थी। दोस्तों के साथ वीसीआर पर देखी थी हमने यह फिल्म, लास्ट वर्किंग डे की  आधी छुट्टी पूरी होने के बाद।

भाग्यश्री का पोस्टकार्ड  हमारी किताबों में भी रहता था । "नो सारॅी, नो थैंकयू" और "दोस्ती की है तो निभानी तो पड़ेगी" सब की जुबान पर रहते थे ।


पर इस पिक्चर के आने से पहले भी स्कूल के दोस्ती के रिश्तों में सच्चाई और ईमानदारी हुआ करती थी। लोग स्लैम बुक में दिल उड़ेल दिया करते थे। कोई लड़की राखी बाँध दे तो सही में बहन हो जाती थी और फिर कहीं भी चले जाओ कुछ सालों तक तो राखी हर साल पहुँचती थी डाक से।

एक लड़की हमारी भी बहन बनी थी उस साल-शालिनी।

तीस साल बीत चुके हैं l हमारा व्यवहार उसके साथ कैसा था, यह तो शायद वह ही बेहतर बता पाए लेकिन वो बिलकुल सगी बहनों जैसी थी l वह वहीँ पास में ही रहती थी और हम स्कूल से दूर l  सो कई बार उसके घर भी चले जाया करते थे . 

पूरे स्कूल में भाषणबाजी में हमारा कोई सानी था तो हमारा गिठ्ठा दोस्त आलोक ।
इंटरहाऊस काम्पटीशन्स में कभी वो जीत जाता कभी हम । पर उससे हमारी दोस्ती में कभी दरार न आई । शायद दिमाग ज्यादा खुले होते थे तब।


एक रोज़ लंच के बाद कल्चरल एक्टिविटी इन-चार्ज, सौदान सिंह सर ने फरमान सुना दिया कि छुट्टी के बाद हमें और आलोक को उनके साथ सिंधिया कन्या विद्यालय जाना है ,एक वाद-विवाद प्रतियोगिता में भाग लेने के लिए।कह दिया की किसी दोस्त के हाथ घर में संदेसा भिजवा दें l  पर हमारी  चिंता वो नहीं थी l हमें तो भूख बहुत लगती थी और हम जानते थे की स्कूल की तरफ से कुछ मिलने वाला है नहीं l शालिनी समझ गयी l छुट्टी हुई तो हमें रुकने को कहकर फ़टाफ़ट अपने घर गई और एक टिफिन पैक कर लाई.


सौदान सिंह जी ने थ्रीव्हीलर बुला लिया था l हमने टिफिन सीट के पीछे लगे तख्ते पे रख दिया l सफर लम्बा था l सिंधिया स्कूल पर उतरे तो टिफिन लेना ही भूल गए l एल्युमीनियम के उस टिफिन में शालिनी न जाने क्या लाई थी पर उसकी भावनाएँ हमें अभिभूत कर गयी थी l 

बोर्ड की परीक्षाओं के बाद मैं ग्वालियर से दिल्ली आ गया l कुछ सालों तक शालिनी की राखी आती रही पर रिश्ते एक तरफ से थोड़े ही निभते हैं l 

तीस साल बाद फेसबुक पर मिली शालिनी. वो वैसी ही थी. और हम भी वैसे ही थे. उसकी और हमारी भावनाएँ भी वैसी ही थीं. पर जिंदगी ने हमें शायद और रूखा कर दिया था. हम दूसरों से ये उम्मीद और भी ज्यादा करने लगें हैं की वो समझ जाएँ बस. हमें कहना न पड़ें. फिर चाहे गलत समझें या सही. 

फ़ोन पर लम्बी बात नहीं कर पाता मैं। व्हाट्सएप से नफरत है मुझे. सब दोस्तों को शिकायत रहती है । ऐसा नहीं की दोस्तों और रिश्तों की कीमत कुछ भी नहीं है मेरे लिए ।पर मैं शायद कुछ अलग हूँ । काफी सारे दोस्त ये बात समझते भी हैं और जो नहीं समझते शायद यह सच्ची कहानी उन्हें समझा दे । 


#हिंदी #संस्मरण #ग्वालियर #राखी #स्कूल 

शनिवार, 17 मार्च 2018

पलाश के फूल






                                पलाश के फूल









बैंक की सीढ़ियाँ उतर फुटपाथ पर कुछ कदम ही आगे बढ़ा था कि सड़क किनारे लगे पलाश के पेड़ से टूट कर दो फूल मेरे आगे गिरे। मैं ठिठक गया। बचपन से ही बड़ा लगाव है मुझे पलाश के फूलों से। रंग ऐसा होता है मानो सुबह, नहा-धोकर पूजा की थाली लेकर खड़ी हो। आकार ऐसा जैसे पर्वतों के बीच कोई मनोरम घाटी आशाओं का अम्बार लिए निमंत्रण दे रही हो। इन फूलों की उपस्थिति इतनी भव्य और प्रभावशाली होती है कि   पलाश के पेड़ को इन फूलों के बिना, केवल वनस्पतियों का वृहत ज्ञान रखने वाले ही पहचान पाते होंगे। मैं आज तक भी बस फूलों को ही  पहचान पाता हूँ। लाल और हरे का जैसा विहंगम समागम पलाश में होता है वैसा तो तोते में भी नहीं होता।





"जिस  पेड़ का अस्तित्व ही उसके फूलों से हो, उसे क्या उन्हें कभी  अलग करना चाहिए ? कितना कृतध्न पेड़ है। शाख पर ही सूख कर झड़ जाँए तो क्या चला जाएगा ।" मैं सोच रहा था।


मैं गिरे हुए फूलों को उठा पाता, एक गाड़ी के पहिये ने उन्हें निर्ममता से कुचल दिया। असामयिक मृत्यु हो गई दोनों की। कुछ क्षण और निहारा मैंने उन्हें , फिर आगे बढ़ गया। 









 सही तो हुआ। उन फूलों का परित्याग उस पेड़ ने किसी कारण से ही किया होगा। मौत, परिवार द्वारा त्याग दिए जाने से बड़ा कष्ट नहीं है। न तो इन्हें कोई गुलदस्ते में सजाता और न ही जूड़े में। अच्छा हुआ, जल्दी मुक्ति मिल गई।

गुरुवार, 7 दिसंबर 2017

सर्दियाँ -तब और अब




                     सर्दियाँ -तब और अब





तब गली से न मोटर साइकिल गुजरती थी
न घमंड भरा हार्न बजाती धुआँ की गाड़ियाँ
सूरज भी तब खुजमिजाज सा था
पुचकारता था, चुटकुले सुनाता था 
धूप बहुत लाड़ लड़ाती थी
हवा काली कलूटी नकचड़ी नहीं थी



खड़ंजे वाली साफ गली में

फुरसत की सुबह होती थी
प्रोजेक्ट और होमवर्क सारी 
छुट्टियाँ नहीं पी जाते थे।
सूरज का बुलावा आते ही
चारपाई पर दादाजी के साथ 
गली की रौनक बन जाते थे। 

गन्ना चूसते मीठे सवाल करते रहते
पर दद्दा के कान  रेडियो पर लगे होते थे
मंजुल की हिन्दी की कमेन्टरी
गावस्कर और विश्वनाथ की रेंगती बैटिंग
बाथॅम और बाबॅ विलीस की
कुटिल मुस्कानें रेडियो पर भी नजर आती थी
तब हर ओवर के बाद मशहूरियाँ 
नहीं आती थीं
हाँ, हर ओवर के बाद दद्दा
हमारे उल्टे सवालों का
पुल्टा जवाब देते थे



कटोरी में धँसा स्टील का गिलास 

भर कर जब दद्दा की चाय आती थी
आधी कटोरी फूंक मिला कर 
गुनगुनी चाय मुझे मिल जाती थी 
खबरें सारी बता कर भी
अखबार खाट पर पड़ा रहता था
जानता था, मूँगफली जब खाई जाएगी
छिलके उसे ही समेटने  होंगे।


तब मनमुटाव ज्यादा नहीं जी पाता था
इमोटीकानॅ असली होते थे
मुस्काने सस्ती होती थी
रिश्तों को गहनों से भी ज्यादा 
सहेजा जाता था।
पड़ोसी कभी कभी दिखने वाले
अंकल आंटी नहीं
चाचा चाची होते थे।
कंपकंपाने वाली ठंड का गुस्सा 
मन में प्यार की गरमाहट से
पिघल जाता था।




अब गुड़ की शकरकंदियाँ नहीं बनती हैं

अब जाड़ों की धूप की बाट 
जोहती चारपाइयाँ नहीं बिछती हैं।
अब दादा-दादी को रखने वाले
बड़े बड़े दिल नहीं होते हैं।
अब पिता की चारपाई पर
बेटे पायते नहीं बैठा करते हैं 
अब बस बदरंग सी सर्दी होती है
गुलाबी जाड़े नहीं होते हैं।
तब ठिठुरते तन को 
मन गरमाहट देता था
अब तन मन दोनों ठिठुरते हैं
ब्लोअर चलाने पड़ते हैं।

शुक्रवार, 27 अक्टूबर 2017

सत्यनारायण भगवान की कथा




सत्यनारायण भगवान की कथा



अर्सा हो गया

मम्मी पापा व्रत लेते थे
सत्यनारायण भगवान की कथा का
हम भाई बहनों में से
किसी एक के लिए।
हम चार थे
सो कथा जल्दी-जल्दी होती थी।
कहानी हमें रट गई थी
कसार पर चार चम्मच चरणामृत
और कटे हुए केले का प्रसाद 
बहुत भाता था।
फिर सब बदल गया
हम बड़े हो गए
अब घर में काम
हमारी मर्ज़ी से होते थे

हम मम्मी पापा जितने
आस्तिक भी नहीं हैं।
या शायद हमें अपने गृह 
कभी भारी लगे ही नहीं ।

उन्हें तो शायद
मम्मी-पापा ने इतना शांत 
कर दिया था कि
वह हम पर 
कभी कुपित हुए ही नहीं  
आज भी सत्यनारायण भगवान नहीं
बड़ी सी कढ़ाई में माँ  भूनती थी 
बस उस कसार की याद आ गई
आज मम्मी पापा की हमारे लिए
फिक्र की याद आ गई।

सोमवार, 28 अगस्त 2017

रामलीला








                                रामलीला 






कल ऐसे ही अपने विधार्थियों से पूछ बैठा कि उनमें से किस-किस ने रामलीला देखी है। उनके उत्तर सुन कर बड़ा आश्चर्य हुआ। कुछ ही ने रामलीला देखी थी वह भी एक या दो दिन । हाँ, टीवी पर रामायण बहुत लोगों ने देखी थी।
दुख हुआ कि एक परम्परा और सास्कृतिक धरोहर मिटने के कगार पर है। इस बात का भी क्षोभ हुआ कि हमारी नई पीढ़ियाँ कितनी शानदार चीजों से वंचित कर दी गई है।



                              




फिर मन में प्रश्न उठे कि क्या रामलीला की  प्रासंगिकता रामचंद्र जी के जीवन मूल्यों को नई पीढ़ी तक पहुँचाने मात्र ही है? यदि हाँ, तो टीवी पर ही देख लेने में क्या बुराई है?

मैं रामलीला को किसी विशेष धर्म के प्रचार व प्रसार के प्रयास के रूप में नहीं देखता।  ऐसे आयोजनों से समाज में उत्साह और उल्लास रहता है। लोग आनंद में रहते हैं तो खर्च करते हैं। सभी का भला होता है।
सोच के देखिए पूरे पैंतीस दिन रौनक- सड़क पर भी और मन में भी। चहल-पहल,  सजे हुए पंडाल, लाउड स्पीकर पर ठुमक चलत रामचंद्र, बाजत पैंजनिया 
बजता रहता है, दशरथ का विलाप, जटायु का करहाना,  रावण की गरजना और अट्टहास गूँजता है मनोरंजन की पराकाष्ठा होती है। फिर यह चिंतन उल्टी चाल चलते हुए मुझे मेरे बचपन में घसीट ले गया।



हमारे मोहल्ले में प्रति वर्ष रामलीला का मंचन होता था। कनागत खत्म होते ही मंदिर में रामलीला की रिहर्सल शुरू हो जाती थी। मुख्य पात्र निश्चित रहते थे और बहुत से लोग एक से अधिक भूमिकाएँ करते थे।
अक्टूबर में हल्की ठंड पड़ने लगती थी। बिना बाजू का स्वेटर माँ जबरदस्ती पहना देती थी। मुझे पहले भेजा जाता था कुर्सियाँ घेरने के लिए। आठ बजे लगभग मंच का पर्दा उठता था। 


उल्लास और उत्साह का माहौल रहता था। पंडाल के बाहर खोमचों की कतारें शाम से ही लग जाया करती थीं। मूंगफली, चाट-पकौड़ी, आइसक्रीम, गुब्बारे, धनुष-बाण, गदा, रामायण के पत्रों के मुखौटे, नकली मूँछे, और हाँ, सरकंडों वाला साँप, याद है न, जो बड़ा और छोटा हो जाता है , सब मिलता था / रामलीला देखते रहिये, मुँह चलाते रहिये / शायद पूरे दिन में वो इतना ना कमा पाते हों जितना शाम से रात तक कमा लेते थे। उन लोगों पर रामचंद्र जी की कृपा उन दस दिनों में खूब होती थी।



                           





नुक्कड़ के दर्जी की दुकान पर काम करने वाला पतला-दुबला लड़का आसिफ सीता का रोल करता था। गजराज भैया  दूध बेचते थे । शरीर और चेहरा भारी-भरकम था। दो महीने पहले से ही मूँछे बढ़ानी शुरू कर देते थे। ढेढ़ इंच चौढ़ी और नथुनों के दोनों ओर चार-चार इंच लम्बी, घनी और किनारों पर दो-तीन बार घूमती हुई काली स्याह मूँछ देखकर छोटे बच्चे तो डर ही जाया करते थे। उनका दमदार ठहाका और कंपा देने वाली आवाज उन्हें साक्षात लंकापति रावण का स्वरूप देती थी। बाकी सब कुछ तो किराए पर आता था लेकिन रावण की पूरी वेशभूषा वे अपनी पर्सनल खरीद कर लाए थे किनारी बाजार से। 
पीछे वाली गली में रहने वाले देवदत्त भाई दशरथ, परशुराम और सुग्रीव , तीनों पात्र बखूबी निभाते थे। उनके दशरथ विलाप के अभिनय पर ईनामों की झड़ी लग जाती थी। ग्यारह, इक्कीस, इक्यावन और कभी कभी तो एक सौ एक भी। गज्जू भाईसाहब पर भी खूब रुपए बरसते थे। राम-सीता विवाह में लोग दिल खोल के कन्यादान देते थे। कलाकारों की यही आय हुआ करती थी।





                                           




रामायण में मेरा सबसे प्रिय पात्र लक्ष्मण  है। काफी सालों तक यह इच्छा भी रही कि एक बार यह पात्र रामलीला में करूँ पर कभी किसी पर जाहिर करने का साहस नहीं हुआ। मोहल्ले की रामलीला का  लक्ष्मण परशुराम संवाद मैं कभी नहीं छोड़ता था। कल्पना करता रहता था कि मैं यदि लक्ष्मण की भूमिका मैं होता तो कैसे करता। 

जहाँ साधारण लोगों को खुशी मिलती थी, गरीब लोगों को अतिरिक्त आय के अवसर मिल जाते थे। इससे न सिर्फ हिन्दू बल्कि मुस्लिम समुदाय के लोग भी होते थे। बच्चों को हमारे देश की परंपरा से साक्षात्कार होता था। कलाकारों को अपनी प्रतिभा दिखाने के लिए मंच मिलता था और जीवन की एकसारता में सकारात्मक परिवर्तन आता था। वर्ष का एक तिहाई भाग उमंग और उल्लास के वातावरण में कटे तो इससे अच्छा क्या हो सकता है।


रामलीला अब भी होती है लेकिन हर मोहल्ले में नहीं। आज के व्यस्त जीवन में दूर जाकर दो-तीन घंटे रामलीला देखना असम्भव है और हम लोगों की अरुचि के कारण के कारण यह हर मोहल्ले में नहीं हो पाती/ लोग इच्छुक तो होते हैं परन्तु उनके पास न धन होता है, न कलाकार और न ही दर्शक/

रामलीला श्रवणकुमार की मातृ-पितृ भक्ति से आरम्भ होती है और भारत मिलाप पर समाप्त होती है / दोनों ही बड़े प्रेरणादायक प्रसंग हैं / है न ? टीवी पर रामायण का सार दूसरे कार्यक्रमों में कहीं खो जाता है/ मंचित रामलीला की अनुभूति कुछ अलग ही होती है/ 








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सोमवार, 21 अगस्त 2017

जिंदगी


                               


                                    जिंदगी



ठहर जाती है कभी, कभी झट से फिसल जाती है,
वक़्त के कांच पर ओस की बूँद जैसी है जिंदगी |
गम में उलझ जाये तो रोये सी फड़फड़ाती है,
बयार खुशियों की चले, तो लहलहाती है जिंदगी |
कभी सब कुछ पाकर भी अधूरेपन से छटपटाती है,
कभी सब कुछ लुटाकर भी मुस्कुराती है जिंदगी |
कभी उमंगों की रेत से आँखों के किनारे महल बनाती है,
पर सच्चाइयों की लहरों को रोक नहीं पाती है जिंदगी |
दिल साँसों की धमकियाँ सहता रहे, तब भी गुज़र जाती है,
पछताना पड़े चाहे, नाजायज़ सपने से रिश्ते बनाती है जिंदगी |

ग़मों से लड़ते लड़ते कितनी ही बार चूर चूर हो जाती है,
फिर भी चुटकी भर खुशियों की राह निहारती है जिंदगी |

रविवार, 20 अगस्त 2017

अनाथ होने की तारीख




                     अनाथ होने की तारीख




कल सुबह  पंडित जी के छप्पर पर चाय पीने के लिए रुका था I  वहीँ बैठे थे ये सज्जन, ईंटों पर रखी पत्थर की पटरी पर I 
मुँह में गुटखा भरा था I मोबाइल सामने पंडित जी के काउंटर पर रखा था I मुंडन होने के बाद आध-आध इंच भर बाल उग आये थे I जिनके बीच चोटी वैसे ही लग रही थी जैसे खेत में बिजूका खड़ा होता है I उस व्यक्ति का चेहरा देखने की मेरी इच्छा नहीं हुई I 
"हमारे पापा गुजर गए न," अचानक वह बोला I मैंने तब भी उसकी ओर नहीं देखा I संवेदना जरूर उचकी I 
"अरे! कब ?" पंडित जी ने हाथ रोक कर पूछा I शायद शिष्टाचारवश I  
"सात तारिख को ," वह बोला, " एँ, नहीं, पांच तारिख को I " पंडित जी के चेहरे पर आश्चर्य तैर गया i मैंने भी उसकी ओर देखा i अब वह सर खुजा रहा था i 
सही तारिख शायद खोपड़ी से भी 'डिलीट' हो गयी थी i 
अब उसने मोबाइल उठा लिया और जुट गया पिता की मृत्यु की तारीख की खोज में i 
उसने मेरी चाय बेस्वाद कर दी थी i उठकर उसे 'नमन' करने को जी चाह रहा था i एक बार तो में पूछ ही बैठा था , "भाई साहब, तेरहवीं हो गयी?" लेकिन मैंने खुद को रोक लिया i 
करीब दो मिनट बाद वह उठा, दो कदम दूर गया, पीक थूककर मुँह खाली किया ओर वापस आकर बोला, " चार तारीख को, पंडित जी i 
पंडित जी ने राहत की सांस ली i 
चाय ख़तम होने तक मैं उसे घूरता रहा i 
सुबह-सुबह ऐसे महानुभावों से परिचय होना, पता नहीं, सौभाग्य था या दुर्भाग्य i 

भला अपने अनाथ होने की तारीख भी कोई भूल सकता है, ओर वो भी इतनी जल्दी ?



शनिवार, 15 जुलाई 2017

नाम गुम जायेगा....गुलज़ार





नाम गुम जायेगा....गुलज़ार 








"....रोज़गार के सौदों में जब भाव-ताव करता हूँ गानों की कीमत मांगता हूँ -सब नज्में आँख चुराती हैं और करवट लेकर शेर मेरे मूंह ढांप लिया करते हैं  सबवो शर्मिंदा होते हैं मुझसे मैं उनसे लजाता हूँ बिकनेवाली चीज़ नहीं पर सोना भी तुलता है तोले-माशों में और हीरे भी 'कैरट' से तोले जाते हैं .मैं तो उन लम्हों की कीमत मांग रहा था जो मैं अपनी उम्र उधेड़ के,साँसें तोड़ के देता हूँ नज्में क्यों नाराज़ होती हैं ?" 

गुलज़ार साहिब की शख्सियत और कविताओं के बारे में लिखना धुप को मुठ्ठी  में पकड़ने जैसा है | बारिश  की बूँदें पक्के  फर्श पर गिरें तो संगीत बजता है, मिटटी पर गिरें तो खुशबू आती है और रेत पर गिरें तो छेद करती हुई धंस जाती हैं | कविता आँखें पढ़ें या कान सुनें, जाकर धँसतीं दिल में है |

                                     कांच के ख्वाब हैं, आँखों में चुभ जायेंगे....

गुलज़ार साहिब की कविता के शब्द रोज़-मर्रा की भाषा के आम शब्द होते हैं | ऐसे शब्द जो कविता का हिस्सा भी बन सकते हैं, कभी शायद ही किसी ने सोचा हो पर सुनो तो लगता है जैसे शायद कविता के लिए ही बना था ये | सुनने में इतना अच्छा तो पहले कभी लगा ही नहीं ये |
हिंदी एक संभ्रांत भाषा है पर हिंदी के गूढ़ शब्दों की बजाय आम बोलचाल के शब्दों का ऐसा अनूठा ताना-बाना बुनते हैं गुलज़ार साहिब कि पढ़ने और सुनने वालों पर जादू हो जाता है | गुलजार साहिब की कविताओं का अपना मिज़ाज़ होता है | जितनी बार पढ़ी जाए, अर्थ गहरा होता जाता है |


"मौत तू एक कविता है
मुझसे एक कविता का वादा है मिलेगी मुझको

डूबती नब्ज़ों में जब दर्द को नींद आने लगे
ज़र्द सा चेहरा लिये जब चांद उफक तक पहुँचे
दिन अभी पानी में हो, रात किनारे के करीब
ना अंधेरा ना उजाला हो, ना अभी रात ना दिन "



कल्पना शब्द का विस्तार कितना होगा? गुलज़ार साहिब के गीतों और कविताओं को पढ़ने के बाद समझ आ जाता है कि इस प्रश्न का कोई औचित्य नहीं है | कल्पना के विस्तार कि सीमा निर्धारित कर पाना असंभव है | " जहाँ न पहुंचे रवि, वहां पहुंचे कवि " का तात्पर्य आँखों के आगे तैरहै |

वो गीत लिखते हैं और 'प्यार' क्या है समझा देते हैं | कौन इन शब्दों को चुनौती  दे सकता है...

" हमने देखी है उन आँखों कि महकती खुशबू
हाथ से चुके इसे रिश्तों का इलज़ाम न दो
सिर्फ एहसास है ये रूह से महसूस करो
प्यार को प्यार ही रहने दो कोई नाम न दो |

प्यार कोई बोल नहीं, प्यार आवाज़ नहीं
एक ख़ामोशी है, सुनती है, कहा करती है
न ये बुझती है, न रुकती है, न ठहरी है कहीं
नूर की बूँद है सदियों से बहा करती है

मुस्कुराहट सी खिली रहती है आँखों में कहीं
और पलकों पे उजाले से झुके रहते हैं
होंठ कुछ कहते नहीं, काँपते होंठों पे मगर
कितने ख़ामोश से अफ़साने रुके रहते हैं | "

इंटरनेट पर इस गीत के बोल जहाँ भी पढ़ें होंगे, उसके नीचे कमेंट पढ़िए | लोगों ने लिखा है, " दिस सॉन्ग है चेंज्ड माय लाइफ " | और कितने गीतों के लिए ऐसी प्रतिक्रिया पढ़ी है आपने ?

गुलज़ार साहब को लफ्जों को बुनने में कमाल की महारत हासिल है। आत्मा दिखती नहीं पर जिन्दगी की आत्मा दिखती है समपूरण सिहँ कालरा जी के शब्दों में।

ऐ जिंदगी, गले लगा ले...

या फिर

तुझसे नाराज नहीं जिंदगी,हैरान हूँ मैं ....


श्रोता, सहर्ष इन लफ्जों से जुड़ जाता है क्योंकि जिंदगी बसती है इन गीतों में।इन कविताओं के शब्द किसी आम आदमी की अलमारी में अलग से रखे आने-जाने के कपड़े पहन कर नहीं निकलते या किसी अमीर की तरह स्पेशल दिन के लिए किसी मंहगे शोरूम से खरीदे कपड़ों में सजे नहीं होते। ये तो मन के  ड्राइंग रूम में जैसे बैठे होते हैं वैसे ही चल देते हैं और खूब रंग जमाते हैं।

गुलज़ार साहब की कविता गैरपारंपरिक है। उपमाएँ अनूठी हैं। ख्वाब कहीं काँच के हैं तो कहीं सात रंग के। कभी रास्ते शिकायत करने लगते हैं तो कभी गले लगा लेते हैं। पहाड़ सबक देते हैं कभी तो कभी नदियाँ। मानवीकरण का इससे अद्भुत उपयोग कभी किसी ने नहीं किया।


किताबे झांकती है बंद अलमारी के शीशों से
बड़ी हसरत से तकती है 
महीनों अब मुलाकाते नही होती
जो शामें इनकी सोहबत में कटा करती थी अब अक्सर
गुजर जाती है कंप्युटर के परदों पर
बड़ी बेचैन रहती है किताबे ....
इन्हे अब नींद में चलने की आदत हो गई है
बड़ी हसरत से तकती है ..

जो कदरें वो सुनाती थी
की जिन के सैल कभी मरते थे
वो कदरें अब नज़र आती नही घर में
जो रिश्ते वो सुनाती थी
वह सारे उधडे उधडे हैं
कोई सफहा पलटता हूँ तो एक सिसकी निकलती है
कई लफ्जों के माने गिर पड़े हैं
बिना पत्तों के सूखे टुंडे लगते हैं वो सब अल्फाज़
जिन पर अब कोई माने नही उगते
बहुत सी इसतलाहें हैं
जो मिटटी के सिकूरों की तरह बिखरी पड़ी है
गिलासों ने उन्हें मतरुक कर डाला 

जुबान पर जायका आता था जो सफहे पलटने का
अब उंगली क्लिक करने से बस इक झपकी गुजरती है
बहुत कुछ तह बा तह खुलता चला जाता है परदे पर
किताबों से जो जाती राब्ता था ,कट गया है
कभी सीने पर रख कर लेट जाते थे
कभी गोदी में लेते थे
कभी घुटनों को अपने रिहल की सूरत बना कर
नीम सजदे में पढ़ा करते थे ,छुते थे जबीं से
वो सारा इल्म तो मिलता रहेगा बाद में भी
मगर वो जो किताबों में मिला करते थे सूखे फूल
और महके हुए रुक्के
किताबें मँगाने ,गिरने उठाने के बहाने रिश्ते बनते थे
उनका क्या होगा
वो शायद अब नही होंगे !!







गुलज़ार साहब की हर एक नज्म एक नायाब तोहफा है शब्दों की मालाओं का शौक रखने वालों के लिए बेशकीमती कलेक्शन हैं ये नज़्में l

नज़्म उलझी हुई है सीने में  
नज़्म उलझी हुई है सीने में 
मिसरे अटके हुए हैं होठों पर 

उड़ते-फिरते हैं तितलियों की तरह 

लफ़्ज़ काग़ज़ पे बैठते ही नहीं 

कब से बैठा हुआ हूँ मैं जानम 

सादे काग़ज़ पे लिखके नाम तेरा

बस तेरा नाम ही मुकम्मल है 

इससे बेहतर भी नज़्म क्या होगी

गुलज़ार साहब कहते हैं...



"मेरे लिए यह चुनाव कर पाना बेहद मुश्किल है कि मेरी अब तक की सबसे पसंदीदा कविता कौन सी है क्योंकि ऐसा करने पर बाक़ी सारी कविताएं बेकार हो जाती हैं."



"अलग-अलग मौक़ों पर अलग-अलग नज़्मों की अहमियत होती है. मेरे ख़्याल से किसी भी शायर के लिए यह मुमक़िन नहीं कि वह कोई एक ऐसी कविता बता सके, जो उसे सबसे ज़्यादा प्रिय हो. हां, यह ज़रूर पूछा जा सकता है कि आज मुझे कौन सी कविता अच्छी लग रही है या यह पूछा जा सकता है कि कल कौन सी कविता मुझे पसंद थी."


कुछ गीत ऐसे होते हैं जो तभी सार्थक लगते हैं जब आप कहानी जानते हों या उन पर हो रहे अभिनय को देख रहे हों । कुछ गीत ऐसे भी होते हैं जिन्हें आप जब सुनें तब वो तस्वीर देखें जिनमें अभिनेता भी आप हों और कहानी भी आपकी हो। ऐसे गीत और उन्हें रचने वाला गीतकार अमर हो जाता है। 


तुम पुकार लो तुम्हारा इंतजार है


हुजूर इस कदर भी न इतरा के चलिए


मेरा कुछ सामान तुम्हारे पास पड़ा है

कतरा-कतरा मिलती है