शनिवार, 8 सितंबर 2018

हीन भावना


                             
                             हीन भावना 







बस से उतर कॉलोनी की सड़क के ढाल पर रिद्धिमान बीस-पचीस कदम लगभग भागते चले गए. पचास पार होने के बाद शुरुआती सालों में पुरुष  आयु को चुनौती देता सा लगता है. शरीर की शिथिलता को नकारता है क्योंकि उत्तरदायित्व अधपके होते हैँ.  'बूढ़े हो गए क्या ?' लोगों के ताने मिलने लगते हैँ . बीस वर्ष पूर्व जो परिवार निरीह और  मूक सा उसके द्वारा किये गए प्रत्येक कार्य के लिए कृतज्ञ दिखता था,  अब उसे उसके कर्तव्य बताता रहता है.  घर में रिद्धिमान का  आदर कम अवहेलना अधिक होती थी.अब वो निरीह और मूक थे . बाकी सब मुखर थे . 

बिना ऊपर की कमाई वाली सरकारी नौकरी जिंदगी से ज्यादा कुंठाएँ  मुहैया कराती है. वो जरूरतें पूरी कर सकती है , इच्छाएँ नहीं. हर वर्ष बच्चे बड़े हो जाते और अपनी शिकायतें कहने का उनका साहस भी बढ़ जाता. हर वर्ष रिद्धिमान के  भीतर का पिता थोड़ा और आहत हो जाता. 

पूर्णिमा, उनकी पत्नी , ढलान पर सजग क़दमों से चल कर आयीं. असहज न दिखने का अतिरिक्त प्रयत्न स्त्री की शालीनता का चिन्ह होता है. पूर्णिमा लोगों को आकर्षित करने के तरीके ढूँढ़ती रहने वाली स्त्री नहीं थी.  उसने कनखियों से इधर-उधर जरूर देखा था. 
पूर्णिमा पँहुची तो पति -पत्नी साथ साथ चलने लगे. कनखियों को बेचैनी की बीमारी लग जाए फिर वो निचली नहीं रहतीं . 
"जिसे तुम्हारी नजरें ढूँढ रही हैँ,  वो पिछले मोड़ पर मुड़ गया, " रिद्धिमान का  लहजा ज़हरीला था. 
"कौन? " पूर्णिमा इस आघात के लिए तैयार नहीं थी,  "क्या मतलब? "
"वही जिसे तुम कनखियों से देखती आ रहीं थीं, वो मुड़ गया. जाने से पहले नजर भर देख गया है तुम्हें," रिद्धिमान का सुर संयत पर तीखा था. 
"तुम मुझ पर लाँछन लगा रहे हो? " पूर्णिमा लगभग चीख पड़ी थी. कनखियाँ अपना काम कर रहीं थीं. पास से गुजरती मोटी औरत को चार कदम बढ़ जाने दिया उसने. "शर्म नहीं आती तुम्हें? " वो दाँत भींच कर बोली. 
"बदचलन औरत,  शर्म भी मुझे ही आनी चाहिए?" रिद्धिमान की आँखें अंगारा हो गई थीं. "बच्चे जवान हो गए पर तेरी हसरतें पूरी नहीं हुईं, " वो सामने देखते हुए गुर्राए. 
पूर्णिमा ने अपने कदम बड़े कर दिए. उनके बीच फांसला बढ़ता गया. रिद्धिमान ने भी उसके पास पँहुचने की कोशिश ना की. घर और पश्चताप पास आता रहा. वैसे भी घर में वो पूर्णिमा को कहाँ कुछ बोल सकते थे. तीनों बच्चे माँ की ढाल बन जाते थे. 

बाल चाँदी बन गए तब जाकर रिद्धिमान को यह एहसास हुआ था दस साल छोटी दुल्हन मिलना योग्यता कम अयोग्यता ज्यादा होता  है. पत्नी की शारीरिक आवश्यकताओं की तुलना में उनकी शारीरिक क्षमताएँ जल्दी बूढ़ी हो गईं थीं. 
उनकी सीमित आय का उल्हाना घर में अक्सर गूँजा करता था पर वो खामोश उल्हाना जो उन्होंने महसूस किया था,  उन्हें ज्यादा कटोचता था. 
शिथिल होकर वो उठना चाहते थे लेकिन पूर्णिमा उन्हें जकड़ लेती थी. पुरुष और पौरुष दोनों आहत हो जाते थे. 
यही रिद्धिमान का मर्ज़ था. 






गुरुवार, 16 अगस्त 2018

एक महान नेता का निधन





            एक महान नेता का निधन



बीती शाम एक महान राजनेता का निधन हो गया. राजकीय शोक और सरकारी छुट्टी घोषित हो गई.
टीवी चैनल उनकी महानता बांचकर टीआरपी का घमासान लड़ रहे थे.
लोगों ने देर तक टीवी देखा. अगले दिन छुट्टी जो थी. लोग टीवी आजकल कानों से देखते हैं, आखें तो व्हाट्सप्प और फेसबुक में उलझी होती हैं.
हम लेखक तो आधे अधूरे ही बने हैं अभी पर insomnia पूरी तरह हो चुका है. चाय की लत है. लूले लंगड़े विचार पालते रहते हैं, दार्शनिक जैसा जो दिखना होता है. छुट्टी थी पर हम साढ़े पाँच बजे ही बिस्तर छोड़ रसोई में घुस गए चाय बनाने को. सुबह की पहली चाय बालकनी पर खड़े होकर पीने का मज़ा ही कुछ और है. किसी को कहते सुना था की लोगों को observe करने से लिखने के लिए मसाला मिल जाता है .
सड़क शुक्रवार जैसी न थी. इत्मीनान हाथों में लेकर रीझ रही थी जैसे किसी भूखे को कोई अमीर सौ का नोट पकड़ा गया हो. शायद लोग सो रहे थे. छः बजे बगल के पंसारी वाले गुप्ता जी की दुकान का शटर घड़घड़ा के खुल गया.
दस मिनट बाद वहाँ मिस्टर जोसफ सिगरेट पीने आये और दुबे जी दूध लेने. चर्चा होने लगी. कान लगाकर लोगों की बातें सुनना भी तो लेखकों को भाता है.
"अरे, वो तो पहले ही मर गए थे, बस डिक्लेअर नहीं किया था. पंद्रह अगस्त थी न" दुबे जी बोले. जैसे सरकार सारी जानकारियाँ उनसे साझा करती हो.
"चलो, आज छुट्टी तो मिली." मिस्टर जोसफ ने सिगरेट का लम्बा काश भरते हुए कहा.
सामने से एक परिवार तैयार होकर बस स्टॉप की और जा रहा था.
"हाँ, देखो, लोग तो घूमने निकल पड़े," दुबे जी ने टिपण्णी की. मर्दों में भी छीटाकशीं के गुण होते ही हैं .
"छुट्टी हुई है की ज्यादा से ज्यादे लोग जाकर पुण्य-आत्मा को श्रद्धांजलि दें. लोग छुट्टी मना रहे है," गुप्ता जी चर्चा में कूद आये.
"या फिर टीवी पर देखें और उनके अच्छे काम याद करें," जोसफ ने राय दी जो बिलकुल उनकी सिगरेट के आखिरी कश की तरह औपचारिक थी. ने अंदर कुछ गया, न बाहर कुछ आया.
"उससे तो टीवी वालों की टीआरपी बढ़ेगी, किसी और को क्या मिलेगा? छुट्टी होनी ही नहीं चाहिए. महान नेताओं की मृत्यु पर काली पट्टी बांधकर काम किया जाना चाहिए. बल्कि एक घंटा एक्स्ट्रा काम करना चाहिए ."
दुबे जी कह ही रहे थे की सामने बालकनी से मिसेस दुबे चिल्लाईं, "बेसन भी ले आइयेगा. नाश्ते में पकौड़े बना लेंगें,"
दुबे जी सकपका गए. मुड़े और गुप्ता जी से बोले, "देना, गुप्ता जी, एक किलो बेसन,"

सोमवार, 9 जुलाई 2018

जीवन का अर्थ



                           

                                                                     जीवन का अर्थ 





अपना-अपना जीवन 
हम सब को 
सीधी पंक्तियों सा लगता है..

सीधी पंक्तियाँ
    सभी के लिए अर्थरहित,
और एक चाह,
    कि कोई तो हो, 
जो देख सके 
इनमें एक रचना
पूर्णतः अर्थपूर्ण ...

यही तलाश ही तो है
जीवन का सत्व 
रिक्तता ही तो है 
जीवन का अर्थ 
क्षणों के साथ आतीं
मरतीं सासें
मोमबत्ती सा जलता
घुलता शरीर,
और एक मन...
हर पल कुछ तलाशता,
बेचैन, उत्सुक, हैरान...
ले चलता है जीवन को,
वक्रता की और,
और जब पूर्ण होता है व्रत 
बीच में से रिक्त
तब मर जाता है जीवन...

कुछ नहीं है जीवन
बस शुन्य मात्र 
और जो समझ लेता है यथार्थ 
वो कहलाता है पागल....

बुधवार, 20 जून 2018




                               मैं अब प्रेम की कवितायेँ नहीं लिखता




मैं अब प्रेम की कवितायेँ नहीं लिखता 
नहीं, भावनाएँ नहीं मरीं हैँ मेरी 
बस उनका मोल समझ गया हूँ 
नहीं चाहता कि स्याही में सानकर 
कागज में परोस कर 
उन्हें सब के सामने रख दूँ.




मैं अब प्रेम की कवितायेँ नहीं लिखता,
नहीं, चाँद-सितारों की उपमाएँ 
बेमानी नहीं लगती मुझे,
पर आपकी प्रेयसी 
अतुलनीय भी तो हो सकती है,
क्यों मैं उसकी तुलना करूँ.



मैं अब प्रेम की कवितायेँ नहीं लिखता,
नहीं, ज्यादा पढ़-लिख नहीं गया हूँ,
पर थोड़ी परिपक्वता कमा ली है,
सोचता हूँ, मेरा प्रेम बस मेरा है,
ख़ुशी-उदासी, उमंग-मायूसी,
जो भी पाऊँ, क्यों बाँटु?



मैं अब प्रेम की कवितायेँ नहीं लिखता,
नहीं, मैं कोई असफल प्रेमी नहीं हूँ,
प्रेम की मेरी परिभाषा कुछ अलग है,
शब्दों की चाशनी में लपेटकर,
कहकर, लिखकर या जताकर,
अपनी भावनाओं का बाजार क्यों लगाऊँ ?



रक्त और विधि के गढ़े रिश्तों के बीच,
प्रेम, मन का बनाया 
एक सुन्दर रिश्ता होता है,
अच्छा हो, बुरा हो,
अपेक्षाओं पर खरा उतरे, न उतरे,
उसे मनोरंजन का सामान क्यों बनाऊँ ?

इसलिए, मैं अब प्रेम की कवितायेँ नहीं लिखता....

मंगलवार, 8 मई 2018

बात उन दिनों की है


                         


                            बात उन दिनों की है 



वो दँसवी के बोर्ड वाला साल था। हमारे चेहरे पर पहला मुँहासा उग चुका था। सो, स्कूल यूनीफार्म की नीली पेंट फैशन वाली हुआ करती थी- आगे दो चुन्नटें, घुटनों पर ढीली और तंग मोरी ।
 ग्वालियर की हवा अजीब ही है. एक तरफ से भिंड के डाकुओं की दहशत और दूसरी तरफ मुरैना की गज़क की मिठास. हम  बहुत जल्दी ढलते थे हर माहौल में. 

" मैंने प्यार किया " उस ही साल रिलीज़ हुई थी। दोस्तों के साथ वीसीआर पर देखी थी हमने यह फिल्म, लास्ट वर्किंग डे की  आधी छुट्टी पूरी होने के बाद।

भाग्यश्री का पोस्टकार्ड  हमारी किताबों में भी रहता था । "नो सारॅी, नो थैंकयू" और "दोस्ती की है तो निभानी तो पड़ेगी" सब की जुबान पर रहते थे ।


पर इस पिक्चर के आने से पहले भी स्कूल के दोस्ती के रिश्तों में सच्चाई और ईमानदारी हुआ करती थी। लोग स्लैम बुक में दिल उड़ेल दिया करते थे। कोई लड़की राखी बाँध दे तो सही में बहन हो जाती थी और फिर कहीं भी चले जाओ कुछ सालों तक तो राखी हर साल पहुँचती थी डाक से।

एक लड़की हमारी भी बहन बनी थी उस साल-शालिनी।

तीस साल बीत चुके हैं l हमारा व्यवहार उसके साथ कैसा था, यह तो शायद वह ही बेहतर बता पाए लेकिन वो बिलकुल सगी बहनों जैसी थी l वह वहीँ पास में ही रहती थी और हम स्कूल से दूर l  सो कई बार उसके घर भी चले जाया करते थे . 

पूरे स्कूल में भाषणबाजी में हमारा कोई सानी था तो हमारा गिठ्ठा दोस्त आलोक ।
इंटरहाऊस काम्पटीशन्स में कभी वो जीत जाता कभी हम । पर उससे हमारी दोस्ती में कभी दरार न आई । शायद दिमाग ज्यादा खुले होते थे तब।


एक रोज़ लंच के बाद कल्चरल एक्टिविटी इन-चार्ज, सौदान सिंह सर ने फरमान सुना दिया कि छुट्टी के बाद हमें और आलोक को उनके साथ सिंधिया कन्या विद्यालय जाना है ,एक वाद-विवाद प्रतियोगिता में भाग लेने के लिए।कह दिया की किसी दोस्त के हाथ घर में संदेसा भिजवा दें l  पर हमारी  चिंता वो नहीं थी l हमें तो भूख बहुत लगती थी और हम जानते थे की स्कूल की तरफ से कुछ मिलने वाला है नहीं l शालिनी समझ गयी l छुट्टी हुई तो हमें रुकने को कहकर फ़टाफ़ट अपने घर गई और एक टिफिन पैक कर लाई.


सौदान सिंह जी ने थ्रीव्हीलर बुला लिया था l हमने टिफिन सीट के पीछे लगे तख्ते पे रख दिया l सफर लम्बा था l सिंधिया स्कूल पर उतरे तो टिफिन लेना ही भूल गए l एल्युमीनियम के उस टिफिन में शालिनी न जाने क्या लाई थी पर उसकी भावनाएँ हमें अभिभूत कर गयी थी l 

बोर्ड की परीक्षाओं के बाद मैं ग्वालियर से दिल्ली आ गया l कुछ सालों तक शालिनी की राखी आती रही पर रिश्ते एक तरफ से थोड़े ही निभते हैं l 

तीस साल बाद फेसबुक पर मिली शालिनी. वो वैसी ही थी. और हम भी वैसे ही थे. उसकी और हमारी भावनाएँ भी वैसी ही थीं. पर जिंदगी ने हमें शायद और रूखा कर दिया था. हम दूसरों से ये उम्मीद और भी ज्यादा करने लगें हैं की वो समझ जाएँ बस. हमें कहना न पड़ें. फिर चाहे गलत समझें या सही. 

फ़ोन पर लम्बी बात नहीं कर पाता मैं। व्हाट्सएप से नफरत है मुझे. सब दोस्तों को शिकायत रहती है । ऐसा नहीं की दोस्तों और रिश्तों की कीमत कुछ भी नहीं है मेरे लिए ।पर मैं शायद कुछ अलग हूँ । काफी सारे दोस्त ये बात समझते भी हैं और जो नहीं समझते शायद यह सच्ची कहानी उन्हें समझा दे । 


#हिंदी #संस्मरण #ग्वालियर #राखी #स्कूल 

शनिवार, 17 मार्च 2018

पलाश के फूल






                                पलाश के फूल









बैंक की सीढ़ियाँ उतर फुटपाथ पर कुछ कदम ही आगे बढ़ा था कि सड़क किनारे लगे पलाश के पेड़ से टूट कर दो फूल मेरे आगे गिरे। मैं ठिठक गया। बचपन से ही बड़ा लगाव है मुझे पलाश के फूलों से। रंग ऐसा होता है मानो सुबह, नहा-धोकर पूजा की थाली लेकर खड़ी हो। आकार ऐसा जैसे पर्वतों के बीच कोई मनोरम घाटी आशाओं का अम्बार लिए निमंत्रण दे रही हो। इन फूलों की उपस्थिति इतनी भव्य और प्रभावशाली होती है कि   पलाश के पेड़ को इन फूलों के बिना, केवल वनस्पतियों का वृहत ज्ञान रखने वाले ही पहचान पाते होंगे। मैं आज तक भी बस फूलों को ही  पहचान पाता हूँ। लाल और हरे का जैसा विहंगम समागम पलाश में होता है वैसा तो तोते में भी नहीं होता।





"जिस  पेड़ का अस्तित्व ही उसके फूलों से हो, उसे क्या उन्हें कभी  अलग करना चाहिए ? कितना कृतध्न पेड़ है। शाख पर ही सूख कर झड़ जाँए तो क्या चला जाएगा ।" मैं सोच रहा था।


मैं गिरे हुए फूलों को उठा पाता, एक गाड़ी के पहिये ने उन्हें निर्ममता से कुचल दिया। असामयिक मृत्यु हो गई दोनों की। कुछ क्षण और निहारा मैंने उन्हें , फिर आगे बढ़ गया। 









 सही तो हुआ। उन फूलों का परित्याग उस पेड़ ने किसी कारण से ही किया होगा। मौत, परिवार द्वारा त्याग दिए जाने से बड़ा कष्ट नहीं है। न तो इन्हें कोई गुलदस्ते में सजाता और न ही जूड़े में। अच्छा हुआ, जल्दी मुक्ति मिल गई।

गुरुवार, 7 दिसंबर 2017

सर्दियाँ -तब और अब




                     सर्दियाँ -तब और अब





तब गली से न मोटर साइकिल गुजरती थी
न घमंड भरा हार्न बजाती धुआँ की गाड़ियाँ
सूरज भी तब खुजमिजाज सा था
पुचकारता था, चुटकुले सुनाता था 
धूप बहुत लाड़ लड़ाती थी
हवा काली कलूटी नकचड़ी नहीं थी



खड़ंजे वाली साफ गली में

फुरसत की सुबह होती थी
प्रोजेक्ट और होमवर्क सारी 
छुट्टियाँ नहीं पी जाते थे।
सूरज का बुलावा आते ही
चारपाई पर दादाजी के साथ 
गली की रौनक बन जाते थे। 

गन्ना चूसते मीठे सवाल करते रहते
पर दद्दा के कान  रेडियो पर लगे होते थे
मंजुल की हिन्दी की कमेन्टरी
गावस्कर और विश्वनाथ की रेंगती बैटिंग
बाथॅम और बाबॅ विलीस की
कुटिल मुस्कानें रेडियो पर भी नजर आती थी
तब हर ओवर के बाद मशहूरियाँ 
नहीं आती थीं
हाँ, हर ओवर के बाद दद्दा
हमारे उल्टे सवालों का
पुल्टा जवाब देते थे



कटोरी में धँसा स्टील का गिलास 

भर कर जब दद्दा की चाय आती थी
आधी कटोरी फूंक मिला कर 
गुनगुनी चाय मुझे मिल जाती थी 
खबरें सारी बता कर भी
अखबार खाट पर पड़ा रहता था
जानता था, मूँगफली जब खाई जाएगी
छिलके उसे ही समेटने  होंगे।


तब मनमुटाव ज्यादा नहीं जी पाता था
इमोटीकानॅ असली होते थे
मुस्काने सस्ती होती थी
रिश्तों को गहनों से भी ज्यादा 
सहेजा जाता था।
पड़ोसी कभी कभी दिखने वाले
अंकल आंटी नहीं
चाचा चाची होते थे।
कंपकंपाने वाली ठंड का गुस्सा 
मन में प्यार की गरमाहट से
पिघल जाता था।




अब गुड़ की शकरकंदियाँ नहीं बनती हैं

अब जाड़ों की धूप की बाट 
जोहती चारपाइयाँ नहीं बिछती हैं।
अब दादा-दादी को रखने वाले
बड़े बड़े दिल नहीं होते हैं।
अब पिता की चारपाई पर
बेटे पायते नहीं बैठा करते हैं 
अब बस बदरंग सी सर्दी होती है
गुलाबी जाड़े नहीं होते हैं।
तब ठिठुरते तन को 
मन गरमाहट देता था
अब तन मन दोनों ठिठुरते हैं
ब्लोअर चलाने पड़ते हैं।